परी रहौं वृषभानु के द्वारैं - श्री वंशी अलि जी

परी रहौं वृषभानु के द्वारैं - श्री वंशी अलि जी

परी रहौं वृषभानु के द्वारैं,
जहाँ मेरी लाड़िली राधा। [1]
खेलत आवै सुख उपजावै,
प्राणन की ये साधा॥ [2]
कीरति कुल उजियारी प्यारी,
हिय की चैन अगाधा। [3]
ठौर नहीं ‘वंशीअलि’ हिय में,
और लगै सब बाधा॥ [4]

- श्री वंशी अलि जी

श्री वंशी अली जी कहते हैं "मैं महाराज विषभानु के महल के द्वार पर पड़ा रहूँगा, जहाँ मेरी लाड़िली श्री राधा हैं।" [1]

उसी द्वार से श्री राधा खेलते हुए आतीं हैं एवं मुझे सुख प्रदान करतीं हैं, जो मेरी जीवन प्राण हैं। [2]

महारानी कीरति के कुल की चंद्र हैं प्यारी श्री राधा, जो मेरे ह्रदय को अगाध शीतलता प्रदान करतीं हैं। [3]

श्री वंशी अली जी कहते हैं, "मेरे ह्रदय में अब कोई स्थान रिक्त नहीं है, सब जगह श्री राधा ही हैं, बाकी सब कुछ मेरे लिए केवल बाधा ही है।" [4]