मेरे गुरु मात पिता, लाड़ली किशोरी एक - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (47)

मेरे गुरु मात पिता, लाड़ली किशोरी एक - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (47)

मेरे गुरु मात पिता, लाड़ली किशोरी एक,
इन्हीं को बल राखों निशि-दिन मन में। [1]
इन्ही की दासी सुखरासी सुख चाहूँ सदा,
प्यारी छवि देखों कभी यमुना पुलिन में॥ [2]
नित उठ चाव सों निहारूँ बाट प्यारी जू की,
छवि देख-देख जीऊँ नैनन की सैनन में। [3]
लाड़ली जू एक बार हार बार चार-चार,
चूड़ी पहिराऊँ नित, प्यारी सखी जन में॥ [4]

- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (47)

मेरी गुरु, माता, पिता केवल एक श्री लाडिली किशोरी श्री राधिका हैं, केवल इन्हीं का बल मेरे हृदय में हर क्षण विद्यमान है। [1]

मेरी यही अभिलाषा है कि सुखराशि स्वरूप श्री राधा जू की ही दासी बनकर प्रेम पूर्वक इनकी सेवा कर इन्हीं को सुख प्रदान करूँ और प्यारी जू की छवि का कभी यमुना पुलिन में दर्शन करूँ। [2]

मेरी यह ही अभिलाषा है कि मैं नित्यप्रति श्री राधा जू की बाट (राह) को विभोर होकर निहारता रहूँ और उनके दिव्य स्वरूप का दर्शन कर अपनी आँखों को परम शीतलता प्रदान करूँ। [3]

श्री हित गोपाल दास जी कहते हैं "हे प्यारी जू, मेरी यह इच्छा है की मैं सखियों के मध्य आपके हस्त कमलों में चार-चार चूड़ी पहनाऊं।" [4]