परिचय :
श्री नंददास जी के विषय में ‘भक्तमाल’ में श्री नाभादास जी ने लिखा है -
(श्री) नन्ददास आनन्द निधि, रसिक सु प्रभु हित रँग मगे॥
लीला पद रस रीति, ग्रन्थ रचना में नागर।
सरस उक्ति जुत जुक्ति, भक्तिरस गान उजागर॥
प्रचुर पयध लौं सुजस, रामपुर ग्राम निवासी।
सकल सुकुल सम्बलित, भक्तपद रेनु उपासी॥
चन्द्रहास अग्रज सुहृद्, परम प्रेम पै में पगे।
(श्री) नन्ददास आनन्द निधि, रसिक सु प्रभु हित रँग मगे॥
- श्री नाभादास जी, भक्तमाल (110)
श्रीनन्ददासजी आनन्दनिधि रसिक प्रभु के प्रेम में मिले हुए थे; श्री युगल लीला रसरीति पद ग्रन्थ की रचना में बड़े प्रवीण हुए; तथा भक्तिरसयुक्त सरस उक्ति युक्ति कथन और गान में अति उजागर थे। आप “श्रीरामपुर" ग्राम के निवासी थे, समुद्रपर्यंत आपका सुयश विख्यात हुआ और सम्पूर्ण सुन्दर कुलवाले ब्राह्मणों में उत्तम ब्राह्मण होते हुए भी श्रीभगवद्भक्तों के चरणरेणु की उपासना सेवा करते थे। श्रीचन्द्रहासजी के बड़े भ्राता श्रीनन्ददासजी अति सुहृद परम प्रेमरूपी जल में मीन के समान पगे रहते थे। श्रीनन्ददासजी आनन्दनिधि रसिक प्रभु के प्रेम में मिले हुए थे।
जन्म :
श्री नंददास जी का जन्म 1513 ई. में उत्तर प्रदेश के एटा जिले में सोरों के पास रामपुर गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम जीवाराम और चाचा का आत्माराम था। वे शुक्ल ब्राह्मण थे और रामपुर ग्राम के निवासी थे। गोस्वामी तुलसीदास जी उनके बड़े गुरुभाई थे। नंददास उनको बड़ी प्रतिष्ठा, सम्मान और श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे। कालांतर में श्री नंददास जी वल्लभ संप्रदाय (पुष्टिमार्ग) के अष्टछाप कवियों में से एक प्रमुख कवि हुए। ये गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के शिष्य हुए।
श्री नंददास जी जन्म से ही काव्य प्रतिभा संपन्न थे। ये प्रभु को पद गाकर सुनाते थे।
विद्याध्ययन एवं आध्यात्मिक जीवन :
श्री नंददास जी काशी में रहकर श्री तुलसीदास जी के संग विद्याध्ययन करते थे। इनके इष्ट श्री राम थे। श्री नंददास जी को रासलीला देखना बहुत अच्छा लगता था। जहाँ भी रासलीला का आयोजन होता वहां श्री नंददास जी दर्शन करने जाते।
ब्रज आगमन :
एक दिन कुछ संत श्री रणछोड़ जी के दर्शन हेतु द्वारिका जाने लगे। श्री नंददास जी भी द्वारिका में श्री रणछोड़ जी के दर्शन के लिए उत्सुक हो गए। उन्होंने अपने बड़े गुरुभाई श्री तुलसीदास जी से द्वारिका जाने की आज्ञा मांगी। श्री तुलसीदास जी श्री रामचंद्र के अनन्य भक्त थे, इसलिए उन्होंने नंददास जी को द्वारिका जाने से मना कर दिया। लेकिन नंददास जी माने नहीं और संतो के संग चल दिए।
वे संतजन काशी से सीधे मथुरा पहुंचे। मथुरा में संत बहुत दिनों तक रुके रहे जिससे श्री नंददास जी उन सबको छोड़ कर द्वारिका जाने लगे। श्री नंददास जी द्वारिका का मार्ग भूल गए और कुरुक्षेत्र के रास्ते से नंदगाव पहुँच गए। श्री नंददास जी नंदगाव में ही रुक गए।
नंदगाव में एक साहूकार क्षत्रिय रहता था जो वैष्णव था। श्री नंददास जी उसके घर भिक्षा लेने गए। उस साहूकार की पत्नी बहुत सुन्दर थी और नंददास जी उसके रूप पर मोहित हो गए। अब नंददास जी दिनभर उस क्षत्राणी के घर के सामने बैठे रहते। जब उस क्षत्राणी का मुख देख लेते तब अपनी कुटिया पर आते। ऐसा करते बहुत दिन बीत गए।
अब इस बात की चर्चा पुरे समाज में फैल गई। उस क्षत्राणी का पति एवं उसके ससुर ने विचार किया अब नंदगाव में नहीं रहना चाहिए। ऐसा विचार कर समस्त परिवार गोकुल के लिए चल दिए क्यूंकि सब श्री गुसाईं जी के सेवक थे। जब नंददास जी को इसकी सूचना मिली तो वे भी उनके पीछे-पीछे कुछ दूरी बनाकर गोकुल जाने लगे। अब वह क्षत्रिय परिवार यमुना जी के किनारे पहुंचे और नांव पर सवार हो यमुना पार उतरे। उन्होंने केवट को कुछ रुपये दिए और कहा की उस ब्राह्मण को (नंददास को) यमुना के इस पार नहीं उतारना क्यूंकी वह हमको कष्ट दे रहा है। उस केवट ने ऐसा ही किया और नंददास यमुना के पार न जा सके। वह क्षत्रिय परिवार गोकुल आ गया और श्री गुसाईं जी के चरणों मे उपस्थित हुआ और प्रणाम किया। श्री गुसाईं जी ने क्षत्री से कहा "तुमने उस ब्राह्मण को यमुना पार क्यों नहीं कराया, उसे यमुना के दूसरी ओर क्यों छोड़ दिया।" तब उस क्षत्री ने विचार किया की किसी ने गुसाईं जी को इसकी सूचना दी होगी या फिर गुसाईं जी जान गए होंगे। ऐसा विचार कर वह क्षत्री पश्चाताप करने लगा। इसके बाद गुसाईं जी ने एक सेवक को भेज कर नंददास जी को बुलवा लिया। श्री नंददास जी गोकुल आए और श्री गुसाईं जी के दर्शन किए। गुसाईं जी के दर्शन करते ही नंददास जी देखने लगे कि मानो ये तो स्वयं श्री कृष्ण ही हैं। नंददास जी ने गुसाईं जी को दंडवत प्रणाम किया और वहीं हाथ जोड़कर खड़े हो गए। श्री नंददास जी को जिस स्वरूप के दर्शन उस क्षत्राणी की आँखों मे होते थे अब वही दर्शन श्री गुसाईं जी मे होने लगे। अब नंददास जी का मन सबसे हटकर श्री गुसाईं जी के चरणों मे लग गया। श्री गुसाईं जी ने नंददास को स्नान कर आने को कहा। नंददास जी स्नान कर आए। तब श्री गुसाईं जी ने श्री नवनीतप्रिया जी के सन्निधान मे नंददास जी को नाम दीक्षा प्रदान की।
इसके बाद श्री गुसाईं जी ने भोजन कर सब वैष्णवों को महाप्रसाद दिया। श्री नंददास जी भी महाप्रसाद पाने बैठे और जैसे की उन्होने अपने मुख मे महाप्रसाद रखा वैसे ही उनका देहानुसंधान न रहा और वे बैठे-बैठे भगवान की दिव्य लीलाओं मे डूब गए। अनेक लीलाओं की स्फूर्ति होने लगी और अब सुबह हो गया लेकिन श्री नंददास जी अब भी बैठे हैं और लीला मे डूबे हैं। सुबह श्री गुसाईं जी ने देखा की नंददास जी तो बैठे ही हैं। उन्होने नंददास जी के कान मे कहा "नंददास, उठो और दर्शन करो"
श्री नंददास जी उठकर खड़े हो गए और श्री गुसाईं जी का दर्शन कर यह पद गाया -
"प्रात समय श्रीवल्लभसुतको उठतहिं रसना लीजिये नाम"
सुबह उठते ही श्री वल्लभाचार्य जी के पुत्र गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के नाम का उच्चारण करना चाहिए।
सुबह उठते ही श्री वल्लभाचार्य जी के पुत्र गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के नाम का उच्चारण करना चाहिए।
इसके बाद नंददास जी श्री नवनीतप्रिया जी के दर्शन करने गए और दर्शन करते ही श्री कृष्ण की बाल लीला की स्फूर्ति होने लगी। तब उन्होने एक पद गाया -
"बालगोपाल ललनकों मोद भरी यशुमति हुलरावत"
श्री यशोदा माता बड़े हर्ष और प्रेम में भरकर बालगोपाल को खेला रही हैं।
श्री यशोदा माता बड़े हर्ष और प्रेम में भरकर बालगोपाल को खेला रही हैं।
अब श्री नंददास जी नित्य भगवान की लीलाओं मे डूबे रहते। वह क्षत्राणी उन्हें मार्ग मे दिखती थी लेकिन श्री नंददास उसकी ओर ही न देखते। ऐसी कृपा श्री गुसाईं जी ने उनपर ऐसी कृपा की कि नंददास जी का मन संसार से हट गया और प्रभु के चरणों मे लग गया।
श्री नंददास जी को श्री कृष्ण की किशोर लीला की स्फूर्ति का प्रसंग :
कुछ समय के बाद श्री गुसाईं जी नंददास जी को साथ लेकर गोवर्धन पधारे। श्री नंददास जी ने श्रीनथजी के दर्शन किए जिनका सुंदर रूप देखकर उन्हें श्री कृष्ण की किशोरलीला की स्फूर्ति हो गयी और उन्होने एक पद गाया -
बनते सखनसंग गायनके पाछे पाछे आवत मोहनलाल कन्हाई॥ 1 ॥
वनते आवत गावत गौरी॥ 2 ॥
देख सखी हरिको वदनसरोज॥ 3 ॥
घर नंदमहरके मिसहीमिस आवत गोकुलकी नारी॥ 4 ॥
श्री कृष्ण अपने सखाओं के संग वन से गायों के पीछे-पीछे आ रहे हैं। 1
वन से आते हुए श्री कृष्ण गौरी राग गा रहे हैं। 2
अरे सखी, श्री कृष्ण के सुन्दर कमल वदन को तो देख। 3
ब्रज की गोपियाँ अपने मन में श्री कृष्ण दर्शन की लालसा लेकर बार-बार किसी न किसी बहाने से महाराज नन्द एवं यशोदा रानी के घर आ रही हैं। 4
श्री कृष्ण अपने सखाओं के संग वन से गायों के पीछे-पीछे आ रहे हैं। 1
वन से आते हुए श्री कृष्ण गौरी राग गा रहे हैं। 2
अरे सखी, श्री कृष्ण के सुन्दर कमल वदन को तो देख। 3
ब्रज की गोपियाँ अपने मन में श्री कृष्ण दर्शन की लालसा लेकर बार-बार किसी न किसी बहाने से महाराज नन्द एवं यशोदा रानी के घर आ रही हैं। 4
इसके बाद श्री नंददास जी ने और बहुत से पद गाए। वे कभी गोवर्धन रहते तो कभी गोकुल रहते एवं नित्य ही दिव्य लीलाओं में डूबे रहते। इनको संसार ऐसा फीका लगता जैसे उल्टी को देखकर बुरा लगता है। नंददास जी गोवर्धन और गोकुल के अलावा कहीं भी आते-जाते नहीं थे। वे सदैव श्री महाप्रभु, श्री गुसाईं जी, गोवर्धन, श्री यमुना और व्रज भूमि के स्वरूप का चिंतन करते थे। प्रभु के दूसरे धामों मे इनकी तनिक भी रुचि नहीं थी।
श्री नंददास जी के पतिव्रत धर्म का एक प्रसंग :
श्री नंददास जी ब्रज छोड़ कर कहीं नहीं जाते थे। एक दिन उनके बड़े गुरुभाई श्री तुलसीदास जी ने सुना की नंददास श्री गुसाईं जी के शिष्य हो गए। तो उन्होंने विचार किया की नंददास श्री राम को छोड़कर श्री कृष्ण के हो गए हैं, उन्होंने अपना पतिव्रता धर्म छोड़ दिया है। ऐसा विचार कर तुलसीदास जी ने नंददास जी को एक पत्र लिखा -
"तुमने अपने पतिव्रत धर्म को छोड़ कर श्री रामचंद्र के स्थान पर श्री कृष्ण की उपासना करने लगे, ऐसा तुमने क्यों किया।"
जब यह पत्र श्री नंददास जी ने पढ़ा तो विनोद ही विनोद में यह उत्तर लिखा -
"श्री रामचंद्र तो एक पत्नीव्रत हैं, दूसरी पत्नी कैसे संभालेंगे, एक पत्नी को ही संभाल न पाए, रावण उनकी पत्नी को हर ले गया। श्री कृष्ण तो अनंत अबलाओं के स्वामी हैं, जिनकी पत्नी होने पर किसी प्रकार का भय नहीं रहता। श्री कृष्ण एक कालावच्छिन्न अनंत पत्नियों को सुख देते हैं, इसलिए मैंने अब कृष्ण को ही अपना पति बना लिया है।"
इस पत्र को पढ़कर श्री तुलसीदास जी विचार करने लगे की नंददास जी तो अब ब्रज में ही रहेंगे, ये ब्रज से बाहर कभी जाते नहीं, और हम अयोध्या छोड़कर काशी में रह रहे हैं, इसलिए श्री नंददास जी की टेक हमसे ऊँची है।
श्री नंददास जी का गुसाईं जी के वचनों में श्रद्धा का एक प्रसंग :
एक दिन श्री नंददास जी ने विचार किया कि मेरे बड़े गुरुभाई श्री तुलसीदास जी ने रामायण की भाषा टिका श्री रामचरितमानस की रचना की है, उसी प्रकार मैं भी श्रीमद्भागवत की भाषा टीका करूँगा। जब यह ब्राह्मणों को पता चला तो वे सब श्री गुसाईं जी के पास आये और उनसे विनती की कि यदि नंददास जी श्रीमद्भागवत की भाषा टीका करेंगे तो हमारी आजीविका नष्ट हो जाएगी, तब कौन हमसे कथा कराएगा।
यह सुनकर श्री गुसाईं जी ने नंददास जी को आज्ञा दी "तुम श्रीमद्भागवत की भाषा टिका मत करो और ब्राह्मणों के क्लेश में मत पड़ो, ब्रह्मक्लेश अच्छा नहीं है, तुम ब्रज लीला के पदों का कीर्तन किया करो।"
श्री नंददास जी ने गुसाईं जी की आज्ञा से श्रीमद्भागवत के भाषा टिका का विचार त्याग दिया। श्री नंददास जी को श्री गुसाईं जी की आज्ञा में ऐसा विश्वास था।
श्री नंददास जी के बड़े गुरुभाई श्री तुलसीदास जी का एक प्रसंग :
एक दिन श्री तुलसीदास जी अपने गुरुभाई श्री नंददास जी से मिलने काशी से ब्रज आये। जब तुलसीदास जी मथुरा पहुंचे तो श्री यमुना जी को प्रणाम किया। फिर नंददास जी का पता पूछकर गोवर्धन आये। यहाँ तुलसीदास जी नंददास जी से मिले। तब तुलसीदास जी नंददास जी से कहने लगे "तुम मेरे साथ चलो, ग्राम में रूचि हो तो अयोध्या वास करो, पुरी में रूचि हो तो काशी में वास करो, पर्वत में रूचि हो तो चित्रकूट में वास करो और यदि वन में रूचि है तो दंडकारण्य में वास करो। ऐसे बड़े-बड़े धाम श्री रामचंद्र जी ने पवित्र किया है।"
यह सुनकर श्री नंददास जी ने उत्तर के रूप में एक पद गाया -
यह सुनकर श्री नंददास जी ने उत्तर के रूप में एक पद गाया -
जो गिरि रुचे तो वसो श्री गोवर्धन, गाम रुचे तो वसो नंदगाम । [1]
नगर रुचे तो वसो श्री मधुपुरी, सोभा सागर अति अभिराम ॥ [2]
सरिता रुचे तो वसो श्री जमुन तट, सकल मनोरथ पूरण काम। [3]
‘नन्ददास’ कानन रुचे तो, वसो भूमि वृंदावन धाम ॥ [4]
- श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, पदावली (22)
यदि पर्वत रुचिकर हो तो श्रीगोवर्धन में निवास करो, यदि ग्राम रुचिकर हो तो नंदगाँव में निवास करो। [1]
यदि तुम्हें नगर रुचिकर हो तो मधुपुरी (मथुरा) में निवास करो, जो समस्त शोभा का सागर एवं मनोहर नगरी है । [2]
यदि तुम्हें नदी रुचिकर हो तो यमुना के तट पर विश्राम करो जहां समस्त हृदय की अभिलाषाएँ पूर्ण होती हैं । [3]
श्री नंददास कहते हैं कि यदि तुम्हें वन रुचिकर हो तो श्री धाम वृन्दावन की भूमि में निवास करो । [4]
इस पद को सुनकर श्री तुलसीदास जी ने कहा कि "ऐसा कौनसा पाप है इस ब्रह्माण्ड में जो श्री राम नाम से नष्ट न होगा, इसलिए तुम श्री रामचंद्र का भजन करो।"
श्री तुलसीदास जी के इन वचनों को सुनकर श्री नंददास जी ने पुनः उत्तर के रूप में एक पद गाया -
कृष्णनाम जबतें में श्रवण सुन्यो री आली भूली री भवन हों तो बावरी भई री।
भरभर आवें नयन चितहुं न परे चैन मुखहुं न आवे वैन तनकी दशा कछु और रहीरी॥
जेतेक नेम धर्म व्रतकीने री मैं बहुविध अंगों अंग भई मैं तो श्रवण मई री।
नंददासप्रभु जाके श्रवण सुने यह गति माधुरी मूरत केधों कैंसी दई री॥
हे सखी, जबसे मैंने कृष्ण नाम सुना है तब से मैं अपना घर भूल कर बावरी सी यहाँ-वहाँ घूम रही हूँ।
मेरी आँखों से बार-बार आँसू गिरने लगते हैं, मेरे मन को कहीं भी अब चैन नहीं मिलता, मेरे मुख से वाणी नहीं निकलती, मेरे शरीर की दशा अब कुछ और ही हो गयी है।
मैंने बहुत धर्म और व्रत किया है, लेकिन कृष्ण नाम का श्रवण कर मेरा प्रत्येक अंग श्रवणमयी हो गया है।
श्री नंददास जी कहते हैं "जिसके केवल नाम के श्रवण से ऐसी दशा हो गयी है, तो वह माधुरी मूरत कैसी होगी।"
इस पद को सुनकर श्री तुलसीदास जी चुप रहे। इसके बाद नंददास जी श्रीनाथजी के दर्शन करने गए, तुलसीदास जी भी पीछे-पीछे मंदिर में आ गए। जब तुलसीदास जी ने श्रीनाथजी के दर्शन किये तो उन्हें मस्तक झुका कर प्रणाम नहीं किया। नंददास जी समझ गए कि ये श्री रामचंद्र के सिवा किसी और के सामने सर नहीं झुकाएंगे। श्री नंददास जी ने विचार किया कि तुलसीदास जी को यहाँ और गोकुल में श्री राम के दर्शन कराऊँ, तब ये श्री कृष्ण के प्रभाव को समझेंगे। ऐसा विचार कर श्री नंददास जी ने श्रीनाथजी से विनती की -
मेरी आँखों से बार-बार आँसू गिरने लगते हैं, मेरे मन को कहीं भी अब चैन नहीं मिलता, मेरे मुख से वाणी नहीं निकलती, मेरे शरीर की दशा अब कुछ और ही हो गयी है।
मैंने बहुत धर्म और व्रत किया है, लेकिन कृष्ण नाम का श्रवण कर मेरा प्रत्येक अंग श्रवणमयी हो गया है।
श्री नंददास जी कहते हैं "जिसके केवल नाम के श्रवण से ऐसी दशा हो गयी है, तो वह माधुरी मूरत कैसी होगी।"
इस पद को सुनकर श्री तुलसीदास जी चुप रहे। इसके बाद नंददास जी श्रीनाथजी के दर्शन करने गए, तुलसीदास जी भी पीछे-पीछे मंदिर में आ गए। जब तुलसीदास जी ने श्रीनाथजी के दर्शन किये तो उन्हें मस्तक झुका कर प्रणाम नहीं किया। नंददास जी समझ गए कि ये श्री रामचंद्र के सिवा किसी और के सामने सर नहीं झुकाएंगे। श्री नंददास जी ने विचार किया कि तुलसीदास जी को यहाँ और गोकुल में श्री राम के दर्शन कराऊँ, तब ये श्री कृष्ण के प्रभाव को समझेंगे। ऐसा विचार कर श्री नंददास जी ने श्रीनाथजी से विनती की -
आजकी सोभा कहा कहूं, भले विराजे नाथ।
तुलसी मस्तक तब नमे, धनुषबाण लेओ हाथ॥
हे प्रभु, आज आपकी शोभा बड़ी सुन्दर हैं, जिसका वर्णन सम्भव नहीं है लेकिन तुलसीदास जी आपको तभी प्रणाम करेंगे जब आप श्री राम जी का रूप धरकर हाथ में धनुष बाण धारण करेंगे।
हे प्रभु, आज आपकी शोभा बड़ी सुन्दर हैं, जिसका वर्णन सम्भव नहीं है लेकिन तुलसीदास जी आपको तभी प्रणाम करेंगे जब आप श्री राम जी का रूप धरकर हाथ में धनुष बाण धारण करेंगे।
यह सुनकर श्रीनाथजी ने सोचा की श्री गुसाईं जी के सेवक की विनती हमको स्वीकार करनी चाहिए। तब श्रीनाथजी ने तुलसीदास जी को श्री राम के रूप में दर्शन दिया और तुलसीदास जी ने श्रीनाथजी को दण्डवत प्रणाम किया। श्री तुलसीदास जी श्रीनाथजी का दर्शन कर बाहर आ गए। इसके बाद नंददास जी गोकुल आ गए और साथ में तुलसीदास जी भी आ गए।
गोकुल में श्री गुसाईं जी विराजमान थे। श्री नंददास जी ने गुसाईं जी को दंडवत प्रणाम किया और तुलसीदास जी ने भी गुसाईं जी को दंडवत प्रणाम किया। तब तुलसीदास जी ने नंददास जी से कहा कि जैसे आपने गोवर्धन में श्री राम के दर्शन करवाए वैसे ही यहाँ भी दर्शन करवाइये। यह सुनकर नंददास जी ने गुसाईं जी से विनती की "जै जै, ये मेरे गुरुभाई हैं तुलसीदास जी, ये श्री राम के सिवा और किसी स्वरुप को प्रणाम नहीं करेंगे, इसलिए कृपा कर इन्हें श्री राम जी के दर्शन करवाइये।"
तब गुसाईं जी तुलसीदास जी से कहा कि तुम यहाँ बैठो। पास में गुसाईं जी के पांचवे पुत्र श्री रघुनाथजी खड़े थे, और उसी काल में श्री रघुनाथ जी का विवाह हुआ था। श्री गुसाईं जी ने श्री रघुनाथ जी से कहा "रघुनाथजी, तुम्हारे सेवक आये हैं, इन्हें दर्शन दो।"
तब श्री रघुनाथजी एवं श्री जानकी बहुजी ने श्री तुलसीदास जी को श्री राम जानकी के रूप में दर्शन दिए। श्री तुलसीदास जी ने दर्शन कर शाष्टांग प्रणाम किया और एक पद गाया -
"वरणों आवधि गोकुलगाम"
इस पद को गाकर श्री तुलसीदास जी सबसे विदा लेकर काशी चले गए।
सो श्री नंददास जी ऐसे भगवद्भक्त थे जिनकी विनती पर श्रीनाथजी ने तुलसीदास जी को श्री राम रूप में दर्शन दिए।
रचना :
श्री नंददास जी ने अनेक ग्रंथों की रचना की जिसमें से कुछ के नाम हैं -
रास पंचाध्यायी, सिद्धान्त पंचाध्यायी, अनेकार्थ मंजरी, मान मंजरी, रूप मंजरी, रस मंजरी, विरह मंजरी, भँवर गीत, गोवर्धन लीला, स्याम सगाई, रुक्मिणी मंगल, सुदामा चरित, भाषा दशमस्कन्ध, पदावली।
लीला संवरण :
नंददास जी का 1583 ई. विक्रमी में गोलोक गमन हुआ। वे उस समय मानसी गंगा पर रहते थे। एक बार अकबर की राजसभा में तानसेन नंददास का प्रसिद्ध पद "देखौ देखौ री नागर नट निरतत कालिन्दी तट" गा रहे थे। उसका अन्तिम चरण था- "नंददास तहं गावै निपट निकट।" बादशाह आश्चर्य में पड़ गये कि नंददास किस तरह 'निपट निकट' थे। वे बीरबल के साथ उनसे मिलने के लिये मानसी गंगा पर गये। अकबर ने नंददास से अपनी शंका का समाधान चाहा। नंददास के प्राण प्रेमविह्वल हो गये, उनकी कामना ने उनको अनुप्राणित किया।
मोहन पिय की मुसकनि, ढलकनि मोरमुकुट की।
सदा बसौ मन मेरे फरकनि पियरे पट की॥
श्री कृष्ण की मुस्कान, उनके मोरमुकुट का ढलकना तथा उनके पीताम्बर का फड़कना सदा मेरे मन में बसा रहे।
श्री कृष्ण की मुस्कान, उनके मोरमुकुट का ढलकना तथा उनके पीताम्बर का फड़कना सदा मेरे मन में बसा रहे।
उनके नेत्र सदा के लिये बंद हो गये। गोसाईं विट्ठलनाथ ने उनके सौभाग्यपूर्ण लीला-प्रवेश की सराहना की। नंददास महारसिक प्रेमी भक्त थे।

