देवि दुःखकुलसागरोदरे दूयमानमति दुर्गतं जनम् - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (8)

देवि दुःखकुलसागरोदरे दूयमानमति दुर्गतं जनम् - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (8)

देवि दुःखकुलसागरोदरे दूयमानमति दुर्गतं जनम्।
त्वं कृपाप्रबलनौकयाद्भुतं प्रापय स्वपदपंकजालयम्॥

- श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (8)

हे देवि श्रीराधिके ! मैं दुःखसमूहरूप दुष्पार सागर में निराश्रय अवस्था में अति दुर्गति को प्राप्त कर रही हूँ। आप अपनी कृपारूप दृढ़ नौका में चढ़ाकर अपने अद्भुत चरणकमल-भवन में मुझे ले जाइये।