(राग आसावरी)
ग्वालिन कृष्ण दरस सों अटकी।
बार बार पनघट पर आवति सिर यमुना जल मटकी॥ [1]
मनमोहन को रूप सुधानिधि पीवत प्रेम रस गटकी।
कृष्णदास धन्य धन्य राधिका लोकलाज सब पटकी॥ [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (160)
श्री कृष्णदास जी कहते हैं "ब्रज की गोपियाँ श्री कृष्ण दर्शन के लिए व्याकुल चित्त हैं, इसलिए बार-बार वे सब पनघट पर आती हैं और अपने सर पर यमुना जल से भरी मटकी रखती हैं।" [1]
गोपियाँ श्री कृष्ण के सुन्दर रूप सुधारस का अपनी आँखों से पान करती हैं। श्री कृष्णदास जी कह रहे हैं "श्री राधिका जी धन्य-धन्य हैं, जिन्होंने श्री कृष्ण प्रेम में समस्त लोक-लाज का त्याग कर दिया है।" [2]
ग्वालिन कृष्ण दरस सों अटकी।
बार बार पनघट पर आवति सिर यमुना जल मटकी॥ [1]
मनमोहन को रूप सुधानिधि पीवत प्रेम रस गटकी।
कृष्णदास धन्य धन्य राधिका लोकलाज सब पटकी॥ [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (160)
श्री कृष्णदास जी कहते हैं "ब्रज की गोपियाँ श्री कृष्ण दर्शन के लिए व्याकुल चित्त हैं, इसलिए बार-बार वे सब पनघट पर आती हैं और अपने सर पर यमुना जल से भरी मटकी रखती हैं।" [1]
गोपियाँ श्री कृष्ण के सुन्दर रूप सुधारस का अपनी आँखों से पान करती हैं। श्री कृष्णदास जी कह रहे हैं "श्री राधिका जी धन्य-धन्य हैं, जिन्होंने श्री कृष्ण प्रेम में समस्त लोक-लाज का त्याग कर दिया है।" [2]

