श्री वृन्दावन धाम में, बसै निरन्तर देह ।
जौ दुर्दैव न बसि सकै, मन दृढ़ करै सनेह ॥
- श्री प्रियादास जी, अनन्य मोदिनी (9)
साधक को यह प्रयत्न करना चाहिए कि उसकी शरीर नित्य श्री वृन्दावन धाम में ही रहे; पर यदि किसी दुर्भाग्यवश (किसी विवशता के कारण) ऐसा संभव न हो, तो जहाँ भी वह हो, वहीं से दृढ़ और अनन्य भाव से अपने मन में श्री वृन्दावन के प्रति प्रेम बढ़ाता रहे।
जौ दुर्दैव न बसि सकै, मन दृढ़ करै सनेह ॥
- श्री प्रियादास जी, अनन्य मोदिनी (9)
साधक को यह प्रयत्न करना चाहिए कि उसकी शरीर नित्य श्री वृन्दावन धाम में ही रहे; पर यदि किसी दुर्भाग्यवश (किसी विवशता के कारण) ऐसा संभव न हो, तो जहाँ भी वह हो, वहीं से दृढ़ और अनन्य भाव से अपने मन में श्री वृन्दावन के प्रति प्रेम बढ़ाता रहे।

