मुख सूख गया यदि रोते हुए, फिर अमृत ही बरसाया तो क्या। [1]
बिरही सागर जब डूब चुके, तब नाविक नाव को लाया तो क्या॥ [2]
दृग लोचन बंद हमारे हुए, तब निष्ठुर तू मुसिकाया तो क्या। [3]
जब जीवन ही न रहा जग मे, तब दर्शन आके दिखाया तो क्या॥ [4]
- ब्रज के सेवैयाँ
इस पद में भक्त अपने आराध्य से मान करते हुए, कटाक्ष के स्वर में कहता है—
जब रोते-रोते मुख सूख गया और प्राण व्याकुल हो उठे, तब यदि अमृत पिलाया तो उसका क्या लाभ? [1]
जब मैं विरह-सागर में पूरी तरह डूब गया, तब नाव लेकर आए तो उससे क्या हुआ? [2]
जब मेरी आँखें सदा के लिए बंद हो गईं, तब यदि तू मुस्कान के साथ सामने आया तो उसका क्या प्रयोजन? [3]
जब मेरा जीवन ही समाप्त हो गया, तब यदि तूने दर्शन दिखाया तो उसका मूल्य क्या रहा? [4]
बिरही सागर जब डूब चुके, तब नाविक नाव को लाया तो क्या॥ [2]
दृग लोचन बंद हमारे हुए, तब निष्ठुर तू मुसिकाया तो क्या। [3]
जब जीवन ही न रहा जग मे, तब दर्शन आके दिखाया तो क्या॥ [4]
- ब्रज के सेवैयाँ
इस पद में भक्त अपने आराध्य से मान करते हुए, कटाक्ष के स्वर में कहता है—
जब रोते-रोते मुख सूख गया और प्राण व्याकुल हो उठे, तब यदि अमृत पिलाया तो उसका क्या लाभ? [1]
जब मैं विरह-सागर में पूरी तरह डूब गया, तब नाव लेकर आए तो उससे क्या हुआ? [2]
जब मेरी आँखें सदा के लिए बंद हो गईं, तब यदि तू मुस्कान के साथ सामने आया तो उसका क्या प्रयोजन? [3]
जब मेरा जीवन ही समाप्त हो गया, तब यदि तूने दर्शन दिखाया तो उसका मूल्य क्या रहा? [4]

