जय वृषभानु नन्दिनी राधा।
शिव ब्रह्मादि जासु पद-पंकज हरि बस हेतु अराधा॥ [1]
करुनामयी प्रसन्न चन्द्रमुख हँसत हरति भव-बाधा।
‘हरीचंद’ ते क्यौं जग जीवत जिन नहिं इनहिं अराधा॥ [2]
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, कार्तिक स्नान (1)
श्री हरीचंद जी कहते हैं "जिनके चरण कमलों की वंदना भगवान शिव और ब्रह्मा करते हैं, वे श्री कृष्ण भी जिनकी आराधना करते हैं, उन वृषभानु नन्दिनी श्री राधा की जय हो।" [1]
करुणामयी श्री राधा के प्रसन्न मुख चंद्र की मुसकान समस्त बाधाओं का हरण कर लेती है। श्री हरीचंद जी कहते हैं "ऐसी परम कृपालु श्री राधा की आराधना जो नहीं करता, उसका जीना ही व्यर्थ है।" [2]
शिव ब्रह्मादि जासु पद-पंकज हरि बस हेतु अराधा॥ [1]
करुनामयी प्रसन्न चन्द्रमुख हँसत हरति भव-बाधा।
‘हरीचंद’ ते क्यौं जग जीवत जिन नहिं इनहिं अराधा॥ [2]
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, कार्तिक स्नान (1)
श्री हरीचंद जी कहते हैं "जिनके चरण कमलों की वंदना भगवान शिव और ब्रह्मा करते हैं, वे श्री कृष्ण भी जिनकी आराधना करते हैं, उन वृषभानु नन्दिनी श्री राधा की जय हो।" [1]
करुणामयी श्री राधा के प्रसन्न मुख चंद्र की मुसकान समस्त बाधाओं का हरण कर लेती है। श्री हरीचंद जी कहते हैं "ऐसी परम कृपालु श्री राधा की आराधना जो नहीं करता, उसका जीना ही व्यर्थ है।" [2]

