प्यारी नैंकु निरखौ नवरंग लालैं - श्री विठ्ठल विपुल देव जी, विट्ठल विपुल देव जू की बानी (19)

प्यारी नैंकु निरखौ नवरंग लालैं - श्री विठ्ठल विपुल देव जी, विट्ठल विपुल देव जू की बानी (19)

(राग सारंग)
प्यारी ! नैंकु निरखौ नवरंग लालैं । 
तुव पद पंकज तल रज बंदत तिलक लगावत भालैं ॥ [1] 
तेरे वरन वसन आभूषण उरधरि चम्पक मालैं ।
श्री बीठल विपुल विनोद करहु मिलि भुज भरि बाहु विसालैं ॥ [2]
- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, विट्ठल विपुल देव जू की बानी (19)

सखी बोली कि हे श्रीस्वामिनी ! इन नवरंगी लाल की ओर नैंक निरखो तो सही ! आपकी पदतली से दलित रज का निज मस्तक पर चरनाकृत कृति तिलक धारण करते हैं । [1]

आपके ही गौर वर्ण का पीताम्बर, स्वर्ण के आभूषण एवं चम्पे की माला धारण किये हैं जिससे उनकी आपमें नित्य ही स्मृति बनी रहे । प्यारी ने रीझकर विनोदकी उमंग से प्यारे को पास में आकर हृदय से लगा लिये। सखीजन बलि बलि करती हुई अशीश देती हैं कि ऐसे ही विनोद करते रहो । [2]