हा हा देर करो न किशोरी - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (7)

हा हा देर करो न किशोरी - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (7)

(राग भैरवी व यमन)
हा हा देर करो न किशोरी।
श्री वृन्दावन वास दीजिए टहल महल नव कुंजन खोरी॥ [1]
बंशीवट तट करत केलि नित अवलोकहुँ सुन्दर वर जोरी ।
ललित लड़ैती आस पुरावो चूक माफ करि लखि निज ओरी॥ [2]

- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (7)

श्री ललित लड़ैती जी कह रहे हैं "हे किशोरी श्री राधा जू, अब देर न कीजिए, मुझे अपने निज महल श्री वृन्दावन की कुञ्ज-निकुंजों का वास एवं महल टहल प्रदान कीजिये।" [1]

ऐसी कृपा कीजिए कि बंशीवट के तट पर मैं नित्य ही सुंदर जोड़ी [श्यामा श्याम] की केली क्रीड़ा का अवलोकन करूँ। श्री ललित लड़ैती जी कहते हैं कि, हे स्वामिनी, मेरे हृदय की आस को अब पूर्ण कर दीजिए। यह तभी सम्भव है जब आप मेरे अपराधों की ओर ध्यान न देते हुए, अपने निज स्वभाव [मृदुता, कृपालता आदि गुणों] की ओर निहारेंगी। [2]