स्ववासोपहारं यशोदासुतं वा, स्वदध्यादिचौरं समाराधयन्तीम् ।
स्वदाम्नोदरे या वबन्धाशु नीव्या, प्रपद्ये नु दामोदरप्रेयसीं ताम् ।।
- जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (2)
जो अपने वस्त्र का अपहरण करने वाले अथवा अपने दूध-दही, माखन आदि चुराने वाले यशोदानन्दन श्रीकृष्ण की साधना करती हैं, जिन्होंने अपनी नीवी (प्रेम) के बन्धन से श्रीकृष्ण के उदर (रस) को शीघ्र ही बांध लिया, जिसके कारण उनका नाम "दामोदर" हो गया; उन दामोदर की प्रियतमा श्री राधा रानी की में निश्चित ही शरण लेता हूँ।
स्वदाम्नोदरे या वबन्धाशु नीव्या, प्रपद्ये नु दामोदरप्रेयसीं ताम् ।।
- जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (2)
जो अपने वस्त्र का अपहरण करने वाले अथवा अपने दूध-दही, माखन आदि चुराने वाले यशोदानन्दन श्रीकृष्ण की साधना करती हैं, जिन्होंने अपनी नीवी (प्रेम) के बन्धन से श्रीकृष्ण के उदर (रस) को शीघ्र ही बांध लिया, जिसके कारण उनका नाम "दामोदर" हो गया; उन दामोदर की प्रियतमा श्री राधा रानी की में निश्चित ही शरण लेता हूँ।

