वह पायेगा क्या रसका चसका - श्री हरेकृष्ण जी

वह पायेगा क्या रसका चसका - श्री हरेकृष्ण जी

(सवैया)
वह पायेगा क्या रसका चसका, नहिं कृष्ण से नेह लगायेगा जो।
‘हरेकृष्ण’ इसे समझेगा वही, रसिकों के समाज में जायेगा जो॥ [1]
ब्रज धूल लपेट कलेवर में, गुण नित्य किसोरी के गायेगा जो।
हँसता हुआ स्याम मिलेगा उसे, निज प्राणों की भेंट चढ़ायेगा जो॥ [2]

- श्री हरेकृष्ण जी

उस जीव को रस का क्या चसका लगेगा जो रसिक शिरोमणी श्री कृष्ण से नेह नहीं लगाता। यह अमूल्य रस तो वही समझ सकता है जो रसिकों की संगति में पहुँचता है [1]

जो जीव अपनी देह को ब्रज रज से लपेट कर श्री राधा के गुण गाता है, जो अपने प्राणों की भी भेंट चड़ाने से पीछे नहीं हटता, ऐसे परम भाग्यशाली जीव को मुस्कुराते हुए श्यामसुंदर मिलते हैं । [2]