स्वकरे सितचामरन्दधद् दयितां रत्नवरासने स्थिताम् ।
सभजत्यनुरागभावतोक्षरद् , वैस पतति गृहे क्वचित् ॥
- श्री वृषभानुपुर शतक (87), श्री वंशी अली द्वारा रचित
प्राणवल्लभा श्रीराधा जी मणिजड़ित श्रेष्ठ आसन पर विराजमान हैं, प्रियतम अपने हाथ में शुक्लवर्ण चँवर को लेकर अनुरागपूर्ण भाव से स्वामिनीजू की सेवा में लगे हुये हैं, (उनकी रूप माधुरी, सौकुमार्य आदि को देखकर) कदाचित् श्रीकृष्ण कुञ्जभवन में गिर पड़ते हैं और पुनः जैसे-तैसे अपने को सम्भालते हैं ।
सभजत्यनुरागभावतोक्षरद् , वैस पतति गृहे क्वचित् ॥
- श्री वृषभानुपुर शतक (87), श्री वंशी अली द्वारा रचित
प्राणवल्लभा श्रीराधा जी मणिजड़ित श्रेष्ठ आसन पर विराजमान हैं, प्रियतम अपने हाथ में शुक्लवर्ण चँवर को लेकर अनुरागपूर्ण भाव से स्वामिनीजू की सेवा में लगे हुये हैं, (उनकी रूप माधुरी, सौकुमार्य आदि को देखकर) कदाचित् श्रीकृष्ण कुञ्जभवन में गिर पड़ते हैं और पुनः जैसे-तैसे अपने को सम्भालते हैं ।

