रस बर्धन यह मान कुँवरि कौ - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (25)

रस बर्धन यह मान कुँवरि कौ - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (25)

(दोहा)
कीरत कूँषि कुमोदनी, सकै बास को जान ।
श्रीभट भानुकुमारि कौ, रसबर्धन यह मान ॥


(पद) [इकताल, राग-केदारौ ]
रस बर्धन यह मान कुँवरि कौ।
कीरत कूंषि कुमोदनी जाकी, सकै बास को जानि कुँवर कौ ।। [1]
मधुर बस्तु ज्यौं खात निरंतर, होत महा सुषदानि कुँवरि कौ ।
बिच-बिच कटुकादिक जै श्रीभट, अति रुचिदायक भानु कुँवरि कौ ।। [2]

- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (25)

(दोहा)
श्रीकीर्ति-कुमारी (राधा) के मान के गूढ़ रहस्य को भला कौन समझ सकता है? श्रीभट्टजी वर्णन करते हैं कि श्रीप्रियाजी का श्रीलालजी से मान करना (रुष्ट होना) वास्तव में रस की अभिवृद्धि में ही परम सहायक सिद्ध होता है।

(पद)
श्रोकीर्ति जी की कोख से कुमुदिनी (कमलिनी) की भांति विकसित किशोरी श्रीराधिका की आनन्द वर्धन करने वाली मानादिक लीलाओं के रस रहस्य को भला कौन जान सकता है। (कुमुदिनी के सौरभ का आनन्द व महत्व कोई जान नहीं पाता)। उनके द्वारा की जाने वाली यह मान लीला भी रस की वृद्धि ही करती है। [1] 

जिस प्रकार मधुर वस्तु को निरन्तर खाने से परम सुख तो अवश्य मिलता है, किन्तु इस आनन्द सुख का महत्व तभी समझ में आ पाता है, जब बीच-बीच में कड़वी तीखी वस्तुओं को भी चखा जाय। अर्थात् श्रीभट्टजी कहते हैं जिस प्रकार बीच-बीच में कटुकादिक वस्तु खाने से मधुर वस्तु का स्वाद और और सुख देने वाला (अति रुचिकर होता है), वैसे ही रस को वर्धन करने में वृषभानुनन्दिनी की यह मान लीला भी उसमें निरन्तर परम सुख की वृद्धि कर, उसके महत्त्व को बनाये रखने वाली तथा रसिकजनों को अति ही रुचिकर प्रतीत होती है । [2]