जा ब्रज रजके परस ते मुक्ति मिलत हैं चार - ब्रज के दोहे

जा ब्रज रजके परस ते मुक्ति मिलत हैं चार - ब्रज के दोहे

जा ब्रज रजके परस ते, मुक्ति मिलत हैं चार।
सो रज ब्रजबाला बधु, डारत डगर बुहार॥

- ब्रज के दोहे

जिस ब्रज की रज के स्पर्श मात्र से चारों प्रकार की मुक्ति स्वतः ही प्राप्त हो जाती है, उसी अमूल्य रज में मानो ब्रज की बालाएं चारों मुक्तियों को झाड़ू लगाकर मार्ग से हटा देती हैं।