अहह विगर्हित-कर्म्मण आस्तां यत्तन्ममातिमूढ़स्य।
नैव जहाति तु वृन्दाविपिनं नैवात्र नाम राधायाः ।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (9.86)
अहा! मै दुष्टकर्मकारी अति मूर्ख हूं, मेरी कुछ भी गति क्यों न हो, किन्तु मैं श्रीवृन्दावन को नहीं छोडूंगा और न ही यहाँ श्रीराधा-नाम को छोडूंगा।
नैव जहाति तु वृन्दाविपिनं नैवात्र नाम राधायाः ।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (9.86)
अहा! मै दुष्टकर्मकारी अति मूर्ख हूं, मेरी कुछ भी गति क्यों न हो, किन्तु मैं श्रीवृन्दावन को नहीं छोडूंगा और न ही यहाँ श्रीराधा-नाम को छोडूंगा।

