धीरे झूलो री राधा प्यारी जी - श्री बनी ठनी जी

धीरे झूलो री राधा प्यारी जी - श्री बनी ठनी जी

धीरे झूलो री राधा प्यारी जी ।
नवल रंगीली सबै झुलावत गावत सखियाँ सारी जी ।। [1]
फरहरात अंचल चल चंचल लाज न जात संभारी जी ।
कुंजन ओट दुरे लखि देखत प्रीतम ‘रसिक बिहारी’ जी ।। [2]
- श्री बनी ठनी जी

हे राधा प्यारी जी, आप धीरे धीरे झूला झुलिए ! समस्त सखियाँ गान करते करते नवल रंगीली श्री राधिका को झूला झूला रही हैं । [1]

श्री बनी ठनी जी कहती हैं कि झूला झूलते हुए आपका चंचल आँचल हवा के साथ साथ उड़ रहा है [एवं सम्भाल नहीं रहा], एवं कुंजों की ओट में दूर से छिप कर रसिक बिहारी [श्री श्याम सुंदर] आपको निहार रहे हैं । [2]