ब्रज की रज मैं भई क्यों न बीर ।
परी रहत गोकुल की डगर में उड़ उड़ लागत स्याम सरीर ।। [1]
सुर नर मुनि ब्रह्मादि दुर्लभ श्रवण सुनत बंसीवट तीर ।
चंद्रसखी भज बालकृष्ण छबि मिल गए मोहन मिट गई पीर ।। [2]
- श्री चन्द्रसखी जी, चंद्रसखी पदावाली (7)
हे सखी, मैं ब्रज की रज क्यूँ न बन गयी? यदि मैं ब्रज की रज होती तो गोकुल की डगर में पड़ी रहती और उड़ उड़ कर श्री श्याम सुंदर के शरीर से जा लगी रहती । [1]
इस रज को प्राप्त करना सुर, नर, मुनि, ब्रह्मादिक इत्यादि की लिए भी दुर्लभ है जिस रज में श्री कृष्ण की मधुर तान बंशीवट के किनारे सुनाई पड़ती है । श्री चंद्रसखी [अपने गुरु बालकृष्ण जी के रूप को याद कर] कहते हैं कि मनमोहन भगवान श्री कृष्ण की प्राप्ति कर समस्त पीड़ा का नाश होता है । [2]

