वृंदावन मोकों अति भावत - श्री सूरदास, सूर सागर

वृंदावन मोकों अति भावत - श्री सूरदास, सूर सागर

(राग धनाश्री)
वृंदावन मोकों अति भावत ।
सुनहु सखा तुम सुबल, श्रीदामा, ब्रज तैं बन गौ चारन आवत ।। [1]
कामधेनु सुरतरु सुख जितने, रमा सहित बैकुंठ भुलावत ।
इहिं बृंदाबन, इहिं जमुना-तट, ये सुरभी अति सुखद चरावत ।। [2]
पुनि-पुनि कहत स्याम श्रीमुख सौं, तुम मेरैं मन अतिहिं सुहावत ।
‘सूरदास’ सुनि ग्वाल चकित भए ,यह लीला हरि प्रगट दिखावत ।। [3]
- श्री सूरदास, सूर सागर

श्री श्यामसुन्दर कहते हैं: अरे सब सखाजन सुबल, श्रीदामा, तुम लोग सुनो! वृन्दावन मुझे बहुत प्रिय है, इसी कारण व्रज से मैं यहाँ वन में गायें चराने आता हूँ । [1]

कामधेनु, कल्पवृक्ष आदि जितने वैकुण्ठ के सुख हैं, लक्ष्मी के साथ वैकुण्ठ के उन सब सुखों को मैं भूल जाता हूँ । यह वृन्दावन, यह यमुना, यहाँ गाय को चराना मुझे अत्यन्त सुखदायी लगता है ।[2]

श्यामसुन्दर बार-बार अपने श्रीमुख से कहते हैं -`तुम लोग मेरे मन को बहुत अच्छे लगते हो । सूरदास जी कहते हैं कि गोपबालक यह सुनकर चकित हो गये, श्रीहरि अपनी लीला एवं वृंदावन के यह रहस्य उन्हें प्रत्यक्ष दिखला (बतला) रहे हैं । [3]