दुराराध्यामाराध्य कृष्णं वशे त्वं - जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (3)

दुराराध्यामाराध्य कृष्णं वशे त्वं - जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (3)

दुराराध्यामाराध्य कृष्णं वशे त्वं, महाप्रेमपूरेण राधाऽभिधाऽभूः।
स्वयं नामकीर्त्या हरौप्रेम यच्छ प्रपन्नाय मे कृष्णरूपे समक्षम् ।।

- जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (3)

श्री राधे ! जिनकी आराधना कठिन है, उन श्रीकृष्ण की भी आराधना करके अपने महान प्रेमसिन्धु की बाढ़ से उन्हें वश में कर लिया। श्रीकृष्ण की अराधना के कारण तुम राधानाम से विख्यात हुई। श्रीकृष्णस्वरूपे ! अपना यह नामकरण स्वयं तुमने किया है, इससे अपने सन्मुख आये हुए मुझ शरणागत को श्री हरिका प्रेम प्रदान करो ।