श्रीवृषभान नृपति के आंगन - श्री नंददास, नंददास ग्रंथावली, पदावली (53)

श्रीवृषभान नृपति के आंगन - श्री नंददास, नंददास ग्रंथावली, पदावली (53)

(राग आसावरी)
श्रीवृषभान नृपति के आंगन, 
बाजत आज वधाई सो ।। 
कीरति देरानी सुखसानी सुता, 
सुलच्छन जाई हो ।। [1]
भक्ति सर्ब दासी है जाकी, 
सियाहूते अधिक सुहाई हो । 
निरबध नेह अबधि रस मूरति, 
प्रगटी सब सुखदाई हो ।। [2]
ब्रह्मादिक सनकादिक नारद,
आनन्द उर न समाई हो । 
नंददास प्रभु पलना पोढ़े, 
किलकत कुँवर कन्हाई हो ।। [3]
- श्री नंददास, नंददास ग्रंथावली, पदावली (53)

आज सब जन राजा श्री वृषभानु के प्रांगण में बधाई गीत गाकर उत्सव मना रहे हैं जहाँ रानी कीर्ति की कोख में समस्त गुणों से युक्त, सुख की खानी स्वरूपा एक पुत्री [श्री राधा] ने जन्म लिया है । [1]

अनगिनत भक्त एवं समस्त शक्ति रखने वाली देवियाँ जिनकी दासी हैं और जो स्वयं सीता से भी अधिक सुंदर हैं।
वह अनंत प्रेम की सिंधु एवं रस की साक्षात मूर्ति हैं, जिनका प्राकट्य अत्यंत सुखदाई है। [2]

भगवान ब्रह्मा, सनक और नारद इत्यादि के मन में भी यह आनंद नहीं समा पा रहा है । श्री नंददास कहते हैं, भगवान कृष्ण उन्हें देखकर देखकर अत्यंत प्रसन्न होते हैं। [3]