उपमा वृंदाविपिन की, देवे को नहिं ओक ।
जाकी सुखमा लेश तें, सर्वोपरि गोलोक ॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (27)
श्री वृन्दावन धाम, जहाँ श्री श्यामा-श्याम नित्य-विहार-परायण हैं, उस नित्य धाम की उपमा किसी से भी देना असम्भव है; जिसकी एक कण-मात्र की सुन्दरता से ही सर्वोपरि गोलोक धाम भी हेय प्रतीत होता है।
जाकी सुखमा लेश तें, सर्वोपरि गोलोक ॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (27)
श्री वृन्दावन धाम, जहाँ श्री श्यामा-श्याम नित्य-विहार-परायण हैं, उस नित्य धाम की उपमा किसी से भी देना असम्भव है; जिसकी एक कण-मात्र की सुन्दरता से ही सर्वोपरि गोलोक धाम भी हेय प्रतीत होता है।

