चलौ वृषभानु गोप के द्वार - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (16)

चलौ वृषभानु गोप के द्वार - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (16)

चलौ वृषभानु गोप के द्वार।
जनम लियौ मोहन हित श्यामा, आनंद-निधि सुकुमार॥ [1]
गावत जुवति मुदित मिलि मंगल, उच्च मधुर धुनि-धार। [2]
बिबिध कुसुम कोमल किसलय दल, सोभित बंदनवार॥ [3]
बिदित वेद-विधि विहित विप्रवर, करि स्वस्तिनु उच्चार। [4]
मृदुल मृदंग, मुरज, भेरी, डफ, दिवि दुंदुभि रवकार॥ [5]
मागध सूत बंदी चारण जस, कहत पुकार-पुकार। [6]
हाटक, हीर, चीर, पाटंबर, देत संभार-संभार॥ [7]
चंदन सकल धेनु-तन मंडित चले जु ग्वाल सिंगार। [8]
(जैश्री) हित हरिवंश दुग्ध-दधि छिरकत, मध्य हरिद्रा गार॥ [9]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (16)

वृषभानु गोप के द्वार पर चलो जहाँ सुकुमार आनन्द निधि स्वरूपा श्रीश्यामा ने मोहन के हित के लिए जन्म लिया है [1]

जहाँ मुदित ब्रज युवतियाँ मिलकर उच्च और मधुर ध्वनि में धारा प्रवाह मंगल गान कर रही हैं। [2]

जहाँ नाना प्रकार के पुष्प एवं कोमल नवीन पत्तों से बनी हुई बन्दनवार शोभित हो रही हैं। [3]

जहाँ श्रेष्ठ ब्राह्मण गण वेद विधि से अनुमोदित आशीर्वादात्मक मन्त्रों का उच्चारण कर रहे हैं। [4]

जहाँ मृदंग, मुरज, भेरी और डफ मृदुल रीति से बज रहे हैं और जहाँ आकाश में दुंदुभी का शब्द हो रहा है। [5]

जहाँ मागध, सूत, बन्दी और चारण ऊच्च स्वर से यश-वर्णन कर रहे हैं। [6]

जहाँ वृषभानु राय सबको सँभाल-सँभाल कर मुहरें, हीरे और रेशमी वस्त्र प्रदान कर रहे हैं। [7]

जहाँ गोपगण सब गायों के शरीर में चन्दन चर्चित करके चले आ रहे हैं। [8]

जहाँ श्रीहित हरिवंशचन्द्र दूध-दही में हल्दी डालकर सब लोगों के ऊपर छिड़क रहे हैं। [9]