त्वं वनराज ! किशोरीचरण द्वन्द्व - श्री वृषभानुपुर शतक (52), श्री वंशी अली द्वारा रचित

त्वं वनराज ! किशोरीचरण द्वन्द्व - श्री वृषभानुपुर शतक (52), श्री वंशी अली द्वारा रचित

त्वं वनराज ! किशोरीचरण द्वन्द्व ममापि दर्शय भोः ।
श्रीमच्छयामलमूर्तेर्हृदियत्तापं समुद्धरति ॥

- श्री वृषभानुपुर शतक (52), श्री वंशी अली द्वारा रचित

हे वनराज ! किशोरी जू के युगल चरणों का दर्शन मुझे भी करा दो, जो ‘चरण’ घनश्याम श्रीकृष्ण के हृदय में विद्यमान ताप को हरण करने वाले हैं ।