जो कोउ वृंदावन रस चाखै - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, फुटकर पद (71)

जो कोउ वृंदावन रस चाखै - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, फुटकर पद (71)

(राग झिंझोटी)
जो कोउ वृंदावन रस चाखै । 
भवन चतुर्दश तिहूं लोक को, सपनिहुँ नहिं अभिलाखै ।। [1]
ललितकिशोरी पड़यौ कोन में श्याम राधिका भाखै ।
जुगुल रूप विनु पलक न खोलैं लोभ दिखावो लाखै ।। [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, फुटकर पद (71)

जो बड़भागी जन श्री वृंदावन का रस चख लेता है उसे चौदह भवन एवं तीनों लोकों का सुख सपने में भी नहीं सुहाता । [1]

श्री ललित किशोरी जी कहते हैं कि वह तो श्री वृंदावन के एक कोने में पड़े रहते हैं एवं श्री श्याम राधिका का नित्य हाई गुणगान करते हैं, चाहे लाख लाख लोभ दिखाए जाएँ परंतु बिना युगल रूप के वह एक क्षण को भी पलक नहीं खोलते । [2]