हमरे निर्धन की धन राधा - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, राग संग्रह (136)

हमरे निर्धन की धन राधा - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, राग संग्रह (136)

हमरे निर्धन की धन राधा ।
साधन कोटि छोड़ी इन्हीं को चरण कमल अवराधा ।। [1]
इनके बल हम गिनत न काहु करत न जिए कोउ साधा ।
‘हरीचंद' इन नख सिख मेरी हरी तिमिर भव बाधा ।। [2]

- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, राग संग्रह (136)

मेरे जैसे निर्धन की धन तो एक मात्र श्री राधा ही हैं । अनंत कोटि साधनों का त्याग करके बस मैंने इन्हीं के चरण कमलों को आराधा [भक्ति की] है । [1]

इन्हीं [श्री राधा] के बल पर ही हम इनके समक्ष किसी की गिनती नहीं करते [चाहे वह कोई भी हो] और न ही इनके अतिरिक्त हृदय से किसी का आश्रय रखते हैं । श्री भारतेंदु हरिशचंद्र जी कहते हैं कि श्री राधा कृपा ने हमारे नख से सिख तक [अर्थात पूर्ण] भव बाधा के अंधकार को मिटा दिया है । [2]