सेवाकृतिर्गुरोराज्ञा बाधनं - महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य, नवरत्नम् (7)

सेवाकृतिर्गुरोराज्ञा बाधनं - महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य, नवरत्नम् (7)

सेवाकृतिर्गुरोराज्ञा बाधनं वा हरीच्छया ।
अतः सेवापरं चित्तं विधायस्थीयतां सुखम् ।।

- महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य, नवरत्नम् (7)

गुरु की आज्ञा के अनुसार ही सेवा करनी चाहिए । परंतु यदि किसी कारणवश गुरु की आज्ञा के अनुसार सेवा न हो पाए तो उसे हरि की इच्छा ही समझना चाहिए एवं उन श्री हरि की इच्छा अनुसार ही चलना चाहिए एवं मन से सेवा करनी चाहिए और सुख में रहना चाहिए ।