रूप तेरौरी मोपै बरन्यौं न जाइ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्द्ध (123)

रूप तेरौरी मोपै बरन्यौं न जाइ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्द्ध (123)

(राग गन्धार)
रूप तेरौरी मोपै बरन्यौं न जाइ।
रोम रोम जो रसना पावौं तौ गाऊँ तेरौ गुन अघाइ ।। [1]
कोटि जतन जौ कीजै कैसैं हूँ सरवा सिंधु न माइ।
कैसैं ‘व्यास’ रंक की बसनी, लंक, सुमेरु समाइ ।। [2]

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्द्ध (123)

हे राधा प्यारी, आपके इस अद्भुत रूप का वर्णन करने का सामर्थ मेरे में नहीं है । यदि मेरे रोम रोम में कोटि कोटि रसना भी हो तो भी मैं आपके गुणों का बखान नहीं कर सकता । [1]

कोटि कोटि प्रयास करके भी एक छोटे से कटोरे में समुद्र का संपूर्ण जल कैसे समा सकता है ? श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि एक भिखारी की छोटी सी बसनी [मुद्रा रखने की थैली] में कैसे सोने की लंका समा सकती है? [2]