(राग सोरठ)
जाहि लगन लगी घनस्यामकी।
धरत कहूँ पग, परत हैं कितहूँ, भूल जाय सुधि धाम की ।।[1]
छबि निहार नहिं रहत सार कछु, घटि पल निसिदिन याम की ।
जित मुँह उठे तितै ही धावै, सुरति न छाया घाम की ।। [2]
अस्तुति निन्दा करौ भलै ही, मेंड़ तजी कुल ग्राम की ।
‘नारायण’ बौरी भइ डोलै, रही न काहू काम की ।। [3]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, युगल छदम लीला (6)
जिसे श्याम सुंदर की साँची लगन लग जाती है वह पग कहीं रखना चाहते हैं परन्तु कहीं और ही उनके पग पड़ते हैं, एवं धाम की सुधि ही भूल जाती है। [1]
वह बड़भागी जन एक क्षण को भी श्री श्याम सुंदर की छवि निहारे नहीं रह सकते हैं। जहाँ मुख उठाते हैं वहीँ ही भागते हैं [श्याम सुंदर से मिलने], उन्हें कष्ट विपत्ति आदि सब भूल हुआ है एवं अपनी सुरति ही बिसर जाती है। [2]
ऐसे बड़भागी जन की चाहे तुम निंदा करो चाहे स्तुति करो, उन्हें कोई हानि अथवा लाभ नहीं है क्यूंकि वह लोक लाज कुल मर्यादा सब त्याग चुके हैं। श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि वह जन तो प्रेम में विभोर होकर डोलते फिरते हैं, वह संसारी लोगों के किस काम आएंगे? [3]

