अन्येषु पुण्य-तीर्थेषु - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.235)

अन्येषु पुण्य-तीर्थेषु - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.235)

अन्येषु पुण्य-तीर्थेषु मुक्तिर् एव महा-फलम् ।
मुक्तैः प्रार्थ्या हरेर् भक्तिर् मथुरायां तु लभ्यते ॥

- श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.235)

अन्य स्थानों एवं धामों में मुक्ति ही सबसे बड़ा फल माना गया है जिसे वहाँ प्राप्त भी किया जा सकता है, परंतु भगवान की भक्ति, जो मुक्तों द्वारा भी वांछित है, उसे मथुरा [ब्रज] में प्राप्त किया जा सकता है।