युगल वर आवत हैं गठ जोरें - श्री गदाधर भट्ट

युगल वर आवत हैं गठ जोरें - श्री गदाधर भट्ट

(राग बिहाग)
युगल वर आवत हैं गठ जोरें ।
संग सोभित वृषभान नन्दिनी ललितादिक तृण तोरें ।। [1]
सीस सेहरो बन्यौं लालकें निरख हसत मुख मोरें ।
निरख निरख बल जाय गदाधर छबि न बढ़ी कछु थोरें ।। [2]

- श्री गदाधर भट्ट

युगल वर श्री श्यामा श्यामा एक दूसरे का आलिंगन कर आ रहे हैं, जिनके संग श्री वृषभानु नंदिनी [श्री राधिका जू] सुशोभित हो रही हैं, जिसको निहार कर श्री ललिता इत्यादि सखियाँ अपने प्राणों को न्यौछावर करती हुई तृण तोड़ रही हैं । [1]

श्री लाल जी [श्याम सुंदर] के शीश पर सुंदर सहरा बना हुआ है, वह श्री राधा रानी को निरख रहे हैं एवं दोनों मुख मोड़ कर हंसते हुए आ रहे हैं । श्री लाडिली लाल की इस अद्भुत छवि [जो छवि, किसी की भी एक दूसरे से कम नहीं है] को देख कर श्री गदाधर भट्ट जी बलिहार जा रहे हैं । [2]