(राग षट)
बाँसुरी बाजत मदन मोहन जू की तट यमुना के तीर री ।
श्रवण सुनत मेरी सुध बुध बिसरी कहा करूँ मेरी बीर री ।। [1]
एक डर तौ मोहि सास ननद को दूजी लोकलाज कुल भीर री ।
'कृष्णदास' गिरधर नहिं मानत, नहिं जानत मेरी पीर री ।। [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी
एक गोपी अपनी सखी से कहती है: हे सखी मैं क्या करूँ, श्री मदन मोहन जू की यमुना तट पर वंशी वादन का श्रवण कर मेरी सुध बुध ही खो जाती है । [1]
श्री कृष्ण दास कहते हैं कि एक तो मुझे सास और ननद का भय, दूजा लोक लाज एवं कुल का, परंतु श्री गिरिधर लाल नहीं मानते एवं मेरी पीड़ा बिना समझे वंशी वादन करते रहते हैं । [2]
बाँसुरी बाजत मदन मोहन जू की तट यमुना के तीर री ।
श्रवण सुनत मेरी सुध बुध बिसरी कहा करूँ मेरी बीर री ।। [1]
एक डर तौ मोहि सास ननद को दूजी लोकलाज कुल भीर री ।
'कृष्णदास' गिरधर नहिं मानत, नहिं जानत मेरी पीर री ।। [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी
एक गोपी अपनी सखी से कहती है: हे सखी मैं क्या करूँ, श्री मदन मोहन जू की यमुना तट पर वंशी वादन का श्रवण कर मेरी सुध बुध ही खो जाती है । [1]
श्री कृष्ण दास कहते हैं कि एक तो मुझे सास और ननद का भय, दूजा लोक लाज एवं कुल का, परंतु श्री गिरिधर लाल नहीं मानते एवं मेरी पीड़ा बिना समझे वंशी वादन करते रहते हैं । [2]

