अनाराध्य राधापदाम्भोजयुग्ममाश्रित्य वृन्दाटवीं तत्पदाकम्।
असम्भाष्य तद्भावगम्भीरचित्तान कुत:श्यामासिन्धो: रहस्यावगाह:॥
- श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, स्व-संकल्प-प्रकाश-स्तोत्र (1)
जिसने श्री राधारानी के चरण रज की एक बार भी आराधना नहीं की, उनके चरण चिन्ह से आच्छादित श्री ब्रज धाम की एक बार भी शरण ग्रहण नहीं की, उनको नित्य लाड़ लड़ाने वाले प्रेमी रसिक भक्तों से एक बार भी वार्ता नहीं की, वह कितना मूर्ख है जो सोचता है कि वह श्री श्याम सुन्दर के रहस्य रुपी प्रेम समुद्र में अवगाहन करेगा।
असम्भाष्य तद्भावगम्भीरचित्तान कुत:श्यामासिन्धो: रहस्यावगाह:॥
- श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, स्व-संकल्प-प्रकाश-स्तोत्र (1)
जिसने श्री राधारानी के चरण रज की एक बार भी आराधना नहीं की, उनके चरण चिन्ह से आच्छादित श्री ब्रज धाम की एक बार भी शरण ग्रहण नहीं की, उनको नित्य लाड़ लड़ाने वाले प्रेमी रसिक भक्तों से एक बार भी वार्ता नहीं की, वह कितना मूर्ख है जो सोचता है कि वह श्री श्याम सुन्दर के रहस्य रुपी प्रेम समुद्र में अवगाहन करेगा।

