(राग कान्हरौ)
सुघर भयै हौ बिहारी याही छाँह तें।
जे जे गटी सुघर सुर जानपनें की
ते ते याही बाँह तें ।। [1]
हुते तौ बड़े अधिक सब ही तैं,
पै इनकी कस न खटात याँह तैं ।। [2]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी
जकि रहे चाह तें ।। [3]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (24)
सखी [ललिता] श्री राधिका से कहती हैं: प्यारी राधे, श्री बाँके बिहारी जी आपकी छाया [चरण कृपा के बल] से ही सुघर [चतुर, कुशल] बन पाये हैं । उनका पूर्ण आकर्षण, निपुणता एवं ज्ञान श्रीजी [राधा] की कृपा से ही है। [1]
यूँ तो वह समस्त कुशलों में भी कुशल हैं एवं सबसे बड़े हैं फिर भी, हे राधे तुम्हारे सामने इनका कोई बल नहीं चलता (अर्थात् इनकी चातुरी, सकल मर्मज्ञा,कला इत्यादि श्यामा जू के समक्ष नहीं ठहर सकती), तुम्हारे समक्ष यह भी दीन ही रहते हैं एवं इन्हें भी कड़ी परीक्षा देनी पड़ती है । [2]
अनन्य नृप्ति ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी महाराज कहते हैं कि श्री बिहारीजी नित्य ही विहार की चाह रखते हैं एवं तुम्हारी कृपा से ही यह नित्य विहार का रस पाते हैं । [3]
सुघर भयै हौ बिहारी याही छाँह तें।
जे जे गटी सुघर सुर जानपनें की
ते ते याही बाँह तें ।। [1]
हुते तौ बड़े अधिक सब ही तैं,
पै इनकी कस न खटात याँह तैं ।। [2]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी
जकि रहे चाह तें ।। [3]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (24)
सखी [ललिता] श्री राधिका से कहती हैं: प्यारी राधे, श्री बाँके बिहारी जी आपकी छाया [चरण कृपा के बल] से ही सुघर [चतुर, कुशल] बन पाये हैं । उनका पूर्ण आकर्षण, निपुणता एवं ज्ञान श्रीजी [राधा] की कृपा से ही है। [1]
यूँ तो वह समस्त कुशलों में भी कुशल हैं एवं सबसे बड़े हैं फिर भी, हे राधे तुम्हारे सामने इनका कोई बल नहीं चलता (अर्थात् इनकी चातुरी, सकल मर्मज्ञा,कला इत्यादि श्यामा जू के समक्ष नहीं ठहर सकती), तुम्हारे समक्ष यह भी दीन ही रहते हैं एवं इन्हें भी कड़ी परीक्षा देनी पड़ती है । [2]
अनन्य नृप्ति ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी महाराज कहते हैं कि श्री बिहारीजी नित्य ही विहार की चाह रखते हैं एवं तुम्हारी कृपा से ही यह नित्य विहार का रस पाते हैं । [3]

