किशोरी ! मेरी जीवन प्राण ।
बार-बार कहा कहि समझाऊँ, दूजी गति नहिं आन ।। [1]
जब देखौं तब उर-नैंननि सुख, बिनु देखैं अकुलान ।
जैश्रीकमलनैंन हित हौं बस तेरैं, जानति हौ जिय जान ।। [2]
- श्री हित कमलनैन, श्री हित कमलनैन जी की वाणी, अष्टायामी पदावली (138)
श्री लाल जी के वचन श्री प्रिया जी से: हे किशोरी जी केवल आप ही मेरी जीवन प्राण हो, मैं बार बार ऐसा कह कर तुमको क्या समझाऊँ, मेरी अन्य दूसरी कोई गति है ही नहीं, बस आपका ही एक मात्र अवलंभ है । [1]
जब मैं तुमको निहारता हूँ, तब मेरे हृदय एवं नयनों में अनंत सुख उमड़ता है, यदि मैं तुमको एक क्षण के लिए भी नहीं निहारता तो मुझे तुम्हारे विरह की पीड़ा में जलना पड़ता है। श्री हित कमल नयन जी कहते हैं: “पुनः श्याम सुंदर बोले कि मैं केवल आपके ही प्रेम के वशीभूत हूँ, हे मेरी प्रान प्यारी, आप इस बात को स्वयं भी भली भाँति जानती ही हैं” । [2]

