दीन हों अधीन हो कुबुद्धि बुद्धि जैसों तैसों,
तेरी ही भरोसौ मोहि और नहिं कोरी कौ। [1]
भूल्यो फिर्यौं देव नाना सेव करि बार बार,
सबै तजि आयौ मैं चरन सरन तोरी कौ॥ [2]
मोसो न आन कोऊ क्रिया मति हीन दीन,
किये पाप भाँति भाँति लाद्यौ बोझ धौरी कौ। [3]
‘विजय सखी’ कोटि बार कहत पुकारि कोई,
तारौ वा न तारौ मैं तौ भानुकी किसोरी कौ॥ [4]
- श्री विजय सखी
हे श्री राधे, चाहे मैं दीन हूँ, आधीन हूँ, कुबुद्धि हूँ—जैसा भी हूँ, मैं केवल आपके ही भरोसे हूँ, [आपका ही अनन्य हूँ], अन्य किसी के आश्रित नहीं हूँ। [1]
सभी देवों और अवतारों की सेवा-अर्चन को भुलाकर, मैं एकमात्र आपके चरणों की शरण में आया हूँ और आपके चरणों का ही अनन्य सेवन करता हूँ। [2]
मेरे जैसा दीन-हीन शायद इस संसार में कोई नहीं होगा। पापों के भारी बोझ को लाद करके, मैं आपकी ओर आया हूँ। [3]
श्री विजय सखी कहती हैं कि मैं बार-बार पुकारकर यही कहती हूँ—चाहे मुझे तारो या ना तारो, पर मैं तो केवल वृषभानु की किशोरी श्री राधिका का ही हूँ। [4]

