यतन्तु कृतिनो यज्ञः तपः स्वाध्याय संयमैः ।
अहं त्वच्चरणाम्भोज रेणोरेवाशया स्थिताः ।।
- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (48)
हे राधे [ स्वामिनि ! ]! भले ही कोई सुकृती यज्ञ, तप, स्वाध्याय (वेद-पाठ) और नियम-संयमों का यजन-साधन करे, किंतु मैं तो केवल आपके श्रीचरण-कमलों की रेणु [ श्रीबृन्दावन ] में ही भली प्रकार से स्थित हूँ और रहूँगी।
अहं त्वच्चरणाम्भोज रेणोरेवाशया स्थिताः ।।
- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (48)
हे राधे [ स्वामिनि ! ]! भले ही कोई सुकृती यज्ञ, तप, स्वाध्याय (वेद-पाठ) और नियम-संयमों का यजन-साधन करे, किंतु मैं तो केवल आपके श्रीचरण-कमलों की रेणु [ श्रीबृन्दावन ] में ही भली प्रकार से स्थित हूँ और रहूँगी।

