श्री चतुर्भुजदास जी की जीवनी

श्री चतुर्भुजदास जी की जीवनी

जन्म :
श्री चतुर्भुजदास जी का जन्म 1597 में ब्रज के जमुनावता ग्राम में हुआ था। इनके पिता अष्टछाप के महान कवी श्री कुम्भनदास जी थे। श्री चतुर्भुजदास जी जन्म से ही श्रीनाथजी के कृपा भाजन बन गए थे और गुसाईं विट्ठलनाथ जी के शिष्य हुए। 
श्री चतुर्भुजदास जी पुष्टिमार्ग में अष्टछाप भक्तों में एक थे।
 
बाल्यकाल :
प्रसंग 1 (श्री चतुर्भुजदास जी के नाम करण का रहस्य) :
श्री चतुर्भुजदास जी कुम्भनदास जी के पुत्र थे। एक दिन कुम्भनदास जी को श्रीनाथजी ने चार भुजा रूप में दर्शन दिए। उसी दिन उनके घर एक पुत्र का जन्म हुआ इसलिए उस पुत्र का नाम चतुर्भुजदास रखा।
 
प्रसंग 2 (दीक्षा एवं श्रीनाथजी की कृपा से बचपन में ही सत्संग करना) :
जब चतुर्भुजदास जी 11 दिन के हुए तो कुम्भनदास जी उनको लेकर गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के पास आये और गुसाईं जी से चतुर्भुजदास जी की नाम दीक्षा करवाई। जब चतुर्भुजदास जी 41 दिन के हो गए तो कुम्भनदास जी ने उन्हें श्री गुसाईं जी के चरणों में निवेदन किया। गुसाईं जी ने चतुर्भुजदास जी को श्रीनाथजी को समर्पण किया। उसी दिन से श्रीनाथजी ने चतुर्भुजदास जी पर ऐसी कृपा की जिससे चतुर्भुजदास जी नवजात शिशु होते हुए भी कभी मुग्धबालक बन जाते तो कभी अलौकिक बातें करने लगते। जब कुम्भनदास जी एकांत में बैठते तो चतुर्भुजदास जी से भगवद चर्चा करते और यदि उस समय कोई आ जाता तो चतुर्भुजदास जी मुग्ध बालक बन जाते। कभी तो श्रीनाथजी चतुर्भुजदास जी को अपने संग खेलने ले जाते। श्री चतुर्भुजदास जी जो लीला देखते वही पद गाते। 
 
श्रीनाथीजी के संग लीला के प्रसंग :
प्रसंग 1 (श्रीनाथजी का चतुर्भुजदास जी के संग माखन चोरी करना) :
एक दिन श्रीनाथजी चतुर्भुजदास जी को संग लेकर एक ब्रजवासी के घर माखन चोरी करने के लिए पधारे। वहां ब्रजवासी की बेटी ने चतुर्भुजदास जी को देख लिया, लेकिन उसे श्रीनाथजी नहीं दिखे। उस बेटी ने घर में सबको बता दिया और चतुर्भुजदास जी पकडे गए जिसके बाद ब्रजवासी जनों ने उनकी खूब पिटाई की। 
बाद में जब चतुर्भुजदास जी श्रीनाथजी के पास आये तो उनसे कहा "महाराज, मुझे तो आपने अच्छी मार खिलवाई"
श्रीनाथजी ने कहा "तुममे क्या सामर्थ्य नहीं थी, क्यों नहीं वहां से भाग आये?" 
सो वे चतुर्भुजदास जी श्री कृष्ण के सखा थे जिनके साथ श्रीनाथजी लीलाएं करते थे। 
 
प्रसंग 2 (श्री चतुर्भुजदास जी को सर्वत्र श्रीनाथजी की लीला का अनुभव होना) :
जिस दिन श्रीचतुर्भुजदास जी को प्रथम लीला का अनुभव हुआ उस दिन से सर्व व्यापी वैकुण्ठ सम्बन्धी लीला उन्हें सर्वत्र दिखने लगा। ये सामर्थ्य इन्हें श्रीनाथजी ने ही प्रदान की थी। 
एक दिन कुम्भनदास जी को प्रभु के पौढ़ने का दर्शन हो रहा था, तो वे पद गाने लगे -
"वे देखो बरत झरोखन दीपक हरि पोढे ऊंची चित्रसारी”
 
श्री कुम्भनदास जी ने इतना ही गाया की चतुर्भुदास जी गाने लगे -
"गाय उठे सुंदर बदन निहारन कारन बहुत यतन राखे कर प्यारी।”
 
यह सुनकर कुम्भनदास जी समझ गए की चतुर्भुजदास जी को श्री गुसाईं जी के कृपा से सम्पूर्ण अनुभव हो गया है। इससे कुम्भनदास जी कृपा का अनुभव कर बहुत प्रसन्न हुए। उस दिन से चतुर्भुजदास जी घर में रहते अथवा बाहर जाते, जल्दी आते अथवा देर से घर आते, कुम्भनदास जी उन्हें कुछ भी कहते नहीं, वे यही समझते की चतुर्भुजदास श्रीनाथजी के संग खेलते होंगे। 
 
प्रसंग 3 (श्री चतुर्भुजदास जी को नित्य नवीन लीला का दर्शन होना) :
एक दिन श्री गुसाईं जी श्रीनाथजी का श्रृंगार कर उन्हें आरसी दिखा रहे थे और चतुर्भुजदास जी प्रांगण से श्रीनाथजी का दर्शन कर रहे थे। उसी समय चतुर्भुजदास जी पद गाने लगे -
सुभग शृङ्गार निरख मोहन को ले दर्पण कर पियहि दिखावें।
आपु न नेक निहारि ये बलिजाऊं आज की छवि कछू कहत न आवें॥
 
इसके बाद गुसाईं जी गोविन्द कुंड पर पधारे। तब एक वैष्णव ने गुसाईं जी पूछा "महाराज, चतुर्भुजदास जी ने आज गाया की 'आज की छवि कछु बरनि न जावै', आप तो श्रीनाथजी का नित्य श्रृंगार करते हैं और उन्हें आरसी दिखाते हैं, लेकिन आजके पद का अभिप्राय कुछ समझ में नहीं आया।"
तब गुसाईं जी ने कहा "चतुर्भुजदास से पूछो"
उस वैष्णव ने चतुर्भुजदास जी से यही प्रश्न पूछा जिसपर चतुर्भुजदास जी ने एक पद गाया -
"माई री आज और काल और छिनछिन प्रति और और"
 
इस पद को सुनकर उस वैष्णव ने गुसाईं जी से पूछा "भगवान की लीला तो नित्य है और सर्वत्र है, तो चतुर्भुजदास जी ने 'और और' क्यों गाया।"
श्री गुसाईं जी ने कहा "भगवान की लीला में यही विलक्षणता है की वह नित्य है लेकिन फिर भी क्षण क्षण नवीन लगता है इसलिए लीला के पात्र और लीला के दर्शन करनेवाले को यह क्षण क्षण नवीन लगता है और नवीन रूचि उत्पन्न करता है।"
 
प्रसंग 4 (श्री चतुर्भुजदास जी के पद सुनने के लिए श्रीनाथजी का रात्री मे जग कर उनके पास आना) :
एक दिन गुसाईं जी गोकुल में विराजे थे और उनके सब पुत्र गोवर्धन में श्रीनाथजी मंदिर में विराजे थे। उन्हीं दिनों गोवर्धन में रास मंडली आयी। श्री गोकुलनाथजी ने श्री गिरिधर जी से आज्ञा लेकर परासौली में रास कराया। रास लीला में गान हुआ। तब श्री गोकुलनाथजी ने चतुर्भुजदास जी से कहा "तुम भी कुछ गाओ"
चतुर्भुजदास जी ने कहा "मेरे सुनने वाले श्रीनाथजी नहीं पधारे हैं तो मैं कैसे गाऊं।"
श्री गोकुलनाथजी ने कहा "तुम न करो, श्रीनाथजी थोड़े ही समय में यहाँ पधारेंगे।"
श्री गोकुलनाथजी की वाणी को सत्य करने के लिए श्रीनाथजी जाग गए और श्री गिरिधर जी को जगाकर उनके संग परासौली पधारे। श्रीनाथजी के दर्शन केवल श्री गोकुलनाथजी को और चतुर्भुजदास को हुआ, बाकि किसी को नहीं। तब श्रीनाथजी के दर्शन करके चतुर्भुजदास जी गाने लगे -
अद्भुत नट भेष धरे।
यमुना तट श्यामसुंदर गुणनिधान गिरिवरधरन रास रंगराचें॥
 
दूसरा पद -
प्यारी ग्रीवा भुजमेल नृत्यत प्रियासुजान॥
 
इस प्रकार चतुर्भुजदास जी ने बहोत पद गाये और रास में बहुत आनंद हुआ। 
प्रातः काल श्री गिरिधर जी ने रात में जागने के कारण श्रीनाथजी को सुबह जगाया नहीं। उसी समय श्री गुसाईं जी गोकुल से पधारे। जब गुसाईं जी ने देखा की श्रीनाथजी को सुबह जगाया नहीं गया तो उन्होंने श्री गिरिधर जी से पूछा "इतनी देर हो गयी है, श्रीनाथजी को क्यों नहीं जगाया।"
श्री गिरिधर जी ने कहा "श्रीनाथजी रात को रास के लिए जगे थे, इसलिए अभी उन्हें जगाया नहीं गया।"
श्री गुसाईं जी ने कहा "श्रीनाथजी सदैव रास करते हैं और सदैव जागते हैं, इसलिए शंखनाद कराओ और श्रीनाथजी को जगाओ।"
तब शंखनाद किया गया और श्रीनाथजी को जगाया गया। इसके बाद गुसाईं जी ने श्री गोकुलनाथ जी को आज्ञा किया "श्रीनाथजी को पधारने के लिए ऐसा आग्रह कभी नहीं करना, ये तो सदैव रास करते हैं, इसलिए इनसे विनती करके इन्हें पधारने को न कहना।"
सो वे चतुर्भुजदास जी ऐसे भक्त थे जो श्रीनाथजी के समक्ष ही गान करते थे, कहीं और नहीं।
 
प्रसंग 5 (श्री चतुर्भुजदास जी को श्री राधा कृष्ण के नवीन लीला का दर्शन होना) :
एक दिन गुसाईं जी ने चतुर्भुजदास जी को आज्ञा किया "तुम अप्सरा कुंड जाओ और रामदास भितरिया को यहाँ आने को कहो और तुम पुष्प लेते आना।"
श्री चतुर्भुजदास जी ने जाकर रामदास भितरिया को गुसाईं जी के पास भेज दिया और स्वयं पुष्प लेने चले गए। जब चतुर्भुजदास जी पुष्प लेकर आ रहे थे तो उसी समय गोवर्धन की कंदरा से श्रीनाथजी और श्री स्वामिनी जी बाहर पधारे। श्री स्वामिनीजी मन में यह विचार कर रही थीं की इस लीला को कोई जानता नहीं है। इतने में चतुर्भुजदास जी आ गए और दर्शन कर यह पद गाने लगे -
गोवर्धन गिरि सघनकन्दरा रैन निवास कियो पियप्यारी॥
 
दूसरा पद -
“रजनी राजकियो निकुंजनगरकी रानी"
 
इन पदों को सुनकर श्री स्वामिनीजी बहुत प्रसन्न हुईं। इसके बाद चतुर्भुजदास जी पुष्प लेकर श्री गुसाईं जी के पास आये। 
 
प्रसंग 6 (श्रीनाथजी का मथुरा पधारना एवं श्री चतुर्भुजदास जी की विरह दशा) :
एक समय श्री गुसाईं जी परदेस गए हुए थे। उस समय श्री गिरिधर जी को ऐसी इच्छा हुई की श्रीनाथजी को मथुरा में अपने घर में पधराऊँ तो ठीक रहेगा। तब श्री गिरिधर जी ने श्रीनाथजी से आज्ञा लेकर फाल्गुन के कृष्ण पक्ष की षष्टी को शयन आरती के बाद श्रीनाथजी को मथुरा ले आये और अपने घर में पधराया। अगले दिन श्री गिरिधर जी ने बहुत बड़ा उत्सव किया जिसमें उन्होंने सर्वस्व अर्पण करने की प्रतिज्ञा कर अपना सब कुछ श्रीनाथजी को अर्पण कर दिया। श्री गिरिधर जी की बेटी जो आयु में बहुत छोटी थी, पान के एक बीड़ा अपने पास रखा था। श्रीनाथजी ने श्री गिरिधर जी की प्रतिज्ञा सत्य करने के लिए वह पान का बीड़ा भी मांग लिया। 
उस समय श्री चतुर्भुजदास जी गिरिराज जी के ऊपर बैठकर विरह के पद गाते थे। श्रीनाथजी नित्य संध्या समय चतुर्भुजदास जी के पद सुनने के लिए गिरिराज जी पधारते थे और उन्हें दर्शन देते थे।
वैशाख के शुक्ल पक्ष के त्रयोदशी के दिन श्री चतुर्भुजदास जी ने यह पद गाया -
श्री गोवर्धन वासी सांबरे लाल तुम बिन रह्यो न जाय हो।
वृजराज लढ़ैते लाड़ले॥
 
जब श्रीनाथजी ने यह पद सुना तो करुणा से व्याकुल हो गए और मन में यह विचार किया की सर्व काल अब यहीं विराजूंगा, क्यूंकि भक्त का दुःसह दुःख देख के श्रीनाथजी से रहा न गया।
अगले दिन चतुर्दशी को ब्रह्म मुहूर्त से पहले श्रीनाथजी ने श्री गिरिधर जी को आज्ञा दी "आज मैं गोवर्धन के ऊपर राजभोग आरोगूंगा।"
तब श्री गिरिधर जी ने मंगला आरती करके सेवकों को भेजकर गोवर्धन के ऊपर श्रीनाथजी का मंदिर स्वच्छ और पवित्र करवाया जिसमे थोड़ा अधिक समय लग गया। श्री गिरिधर जी श्रीनाथजी को लेकर गोवर्धन आये और श्रीनाथजी को पधराया, लेकिन इसमें समय बहुत बीत गया और राजभोग का समय बीत गया था। इसलिए श्रीनाथजी को राजभोग और शयनभोग एक संग लगाया गया। 
उस दिन से आज तक नरसिंह चतुर्दशी के दिन श्रीनाथजी को 2 बार राजभोग पधराया जाता है। 
सो वे चतुर्भुजदास जी ऐसे कृपापात्र थे जिनके बिना श्रीनाथजी रह नहीं सकते थे। 
 
श्री चतुर्भुजदास जी के समस्त परिवार मे भक्ति का प्रसंग :
श्री चतुर्भुजदास जी के पुत्र राघवदास थे। उन्हें जब भगवान की लीला का अनुभव हुआ तो उन्होंने धमार गायी -
"ए चल जाएं जहां हरि क्रीडत गोपिन संगा"
 
राघवदास ने इस धमार की जब 10 तुक गायी तो उनका देह छूट गया और वे भगवान की लीला में प्रवेश कर गए। तब राघवदास की बेटी ने डेढ़ तुक गाया जिससे धमार पूरी हो गयी। 
सो वे चतुर्भुजदास जी एवं उनका समस्त परिवार ऐसा भगवद्भक्त था। 
 
रचना :
श्री चतुर्भुजदास द्वारा रचित 400 पद प्राप्त होते हैं। 

लीला संवरण :
श्री चतुर्भुजदास जी 45 वर्षों तक भूतल पर रहे और 1642 मे देह त्याग कर लीला प्रवेश किया।