(राग हल्हैया)
जमुना जल विमलत जुगल किशोर।
उबटि न्हाइ पहिरि पट भूषन सजि सिंगार दुहुं ओर ।।
रस भोगी रस भोगत रुचि सों हिल मिल हियो हिलोर ।
भगवत अधर पान अचवन लै बीरी देत मुख जोर ।। [2]
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ 3 (4)
युगलकिशोर श्रीश्यामा-कुंजविहारी (अपने केलि-विलास-द्वारा) श्रीयमुनाजी के जल को निर्मल बना रहे हैं। पहले इन प्रियालाल ने उबटन करके यमुना-जल में स्नान किया है, फिर वस्त्राभूषण धारण करके ऐसे सज गये हैं, जैसे एक ही श्रृंगार रस दोनों ओर (दो रूपों में) सज्जित हो गया हो। [1]
इसके बाद प्रेम-रस का आस्वादन करने वाले ये नित्यदम्पती रुचि के अनुसार हिल-मिलकर रस-विलास करते हुए हृदयों में आनन्द की हिलोरें उत्पन्न कर रहे हैं। श्री भगवत अली जी कहती हैं कि इस प्रकार रस-भोगकर अधरामृत-पान का आचमन लेने के पश्चात् प्रियालाल मुख-मेलन की बीरी एक-दूसरे को प्रदान कर रहे हैं। [2]
जमुना जल विमलत जुगल किशोर।
उबटि न्हाइ पहिरि पट भूषन सजि सिंगार दुहुं ओर ।।
रस भोगी रस भोगत रुचि सों हिल मिल हियो हिलोर ।
भगवत अधर पान अचवन लै बीरी देत मुख जोर ।। [2]
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ 3 (4)
युगलकिशोर श्रीश्यामा-कुंजविहारी (अपने केलि-विलास-द्वारा) श्रीयमुनाजी के जल को निर्मल बना रहे हैं। पहले इन प्रियालाल ने उबटन करके यमुना-जल में स्नान किया है, फिर वस्त्राभूषण धारण करके ऐसे सज गये हैं, जैसे एक ही श्रृंगार रस दोनों ओर (दो रूपों में) सज्जित हो गया हो। [1]
इसके बाद प्रेम-रस का आस्वादन करने वाले ये नित्यदम्पती रुचि के अनुसार हिल-मिलकर रस-विलास करते हुए हृदयों में आनन्द की हिलोरें उत्पन्न कर रहे हैं। श्री भगवत अली जी कहती हैं कि इस प्रकार रस-भोगकर अधरामृत-पान का आचमन लेने के पश्चात् प्रियालाल मुख-मेलन की बीरी एक-दूसरे को प्रदान कर रहे हैं। [2]

