कण-कण में जा रेणु के, बसत लाल के प्रान - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (435.6)

कण-कण में जा रेणु के, बसत लाल के प्रान - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (435.6)

कण-कण में जा रेणु के, बसत लाल के प्रान ।
हाय सोहनी ताहि याँ, साधारण मत मान॥

- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (435.6)

श्री प्रियाजी के चरणों की इस पावन रज (वृन्दावन-रज) के कण-कण में श्री लालजी के प्राण बसे हुए हैं। अरी सोहनी! इसे साधारण मत समझ; यह अत्यंत दिव्य और दुर्लभ है।