श्री भोलानाथ जी (हितभोरी) की जीवनी 

श्री भोलानाथ जी (हितभोरी) की जीवनी 

जन्म :
भोरी सखी जिनका वृंदावन आगमन से पूर्व नाम भोलानाथजी था, उनका जन्म भेलसा (मध्यप्रदेश) में 1890 में हुआ था। यह नगर भोपाल के पास स्थित है। ये अर्वाचीन काल के एक श्रेष्ठ वाणीकार हैं। ये जन्मजात भक्त और कवि थे।
इनके पिता का नाम छेदीलाल था। वे सक्सेना कायस्थ थे।

बाल्यकाल :
भोलानाथजी के जीवन-संबंधी एक बड़ी ही प्रेरणास्पद घटना है। भोलानाथजी को बचपन से भग्वद्प्रप्ती की धुन थी। इसके लिए योग्य गुरु की खोज के लिए ये घर से निकल पड़े। दो सप्ताह की निरन्तर खोजबीन के बाद ये नरसिंहपुर जिले के एक वन में पाए गये। उस समय इनके बड़े भाई बैजनाथजी कोलारस जिला शिवपुरी में नाजिर थे। बैजनाथजी भोलानाथ जी को घर ले आये। 

दीक्षा :
कोलारस में ही श्रीकृष्ण का एक मन्दिर था। इनके भाई बैजनाथजी ने मंदिर के सेवाधिकारी पं. गोपालजी से भोलानाथजी को राधावल्लभ-सम्प्रदाय में दीक्षित करवा दिया। 

शिक्षा एवं विवाह :
श्री भोलानाथ जी को गृहस्थ जीवन में कोई रूचि नहीं थी लेकिन राधावल्लभ-सम्प्रदाय में दीक्षित हो जाने के बाद भोलानाथजी ने अपने गुरु की आज्ञा शिरोधार्य कर गृहस्थ जीवन में रहते हुए उपासना करना स्वीकार कर लिया और विवाह न करने का अपना हठ छोड़कर वैवाहिक जीवन व्यतीत करने के लिए सहमत हो गये।
भोलानाथजी जब बी.ए. के विद्यार्थी थे, तब इन्होंने अखिल भारतीय रामायण-प्रतियोगिता में भाग लेकर मर्यादापुरुषोत्तम राम पर एक लेख लिखा और उस पर प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया ।
इस प्रकार एक प्रतिभावान् गृहस्थ के रूप में इनकी ख्याति बढ़ती गयी।

छतरपुर के राजा विश्वनाथ जी के यहाँ नियुक्ति एवं राजकीय ग्रंथालय से वाणियों का परिचय :
श्री भोलानाथ जी के धार्मिक वैदुष्य से आकृष्ट होकर छतरपुर-नरेश विश्वनाथ सिंह ने इनको अपना धार्मिक परामर्शदाता नियुक्त किया। उस समय तक राजा विश्वनाथ सिंह ने राधावल्लभीय सम्प्रदाय की वाणियों का संग्रह कर लिया था। छतरपुर-नरेश के यहाँ इनका कार्य मात्र राजासाहब से धार्मिक चर्चा करना था। यहाँ इनको स्वाध्याय का बहुत समय मिल जाता था। यह इनके लिए बहुत अच्छा सुयोग था। राजकीय ग्रन्थालय का सदुपयोग करते हुए इन्होंने भक्तों की वाणियों के साथ ही भारतीय दर्शन का भी गहन अनुशीलन किया। कुछ समय बाद ये छतरपुर राज्य की नौकरी छोड़कर भेलसा चले गये ।

पत्नी, पुत्र एवं पिता की मृत्यु के बाद वृन्दावन आगमन :
भेलसा में रहकर इन्होंने वकालत आरम्भ की। कुछ दिन बाद भेलसा से अपने भाई के पास कोलारस जाकर वकालत की, किन्तु वहाँ भी इनका मन नहीं लगा । तब राजा साहब के आमन्त्रण पर ये पुनः छतरपुर चले गये। 
लेकिन इनका मन ब्रज में स्थित प्रेम रस धाम वृन्दावन का अबिचल वास प्राप्त करने, कदम्ब के वृक्षों की छाया में बैठकर जुगल-नाम का निरन्तर भजन करने, ब्रजवासियों का जूँठन प्रसाद खाने, यमुना जल का पान करने, रसिकजनों का सत्संग-लाभ प्राप्त करने एवं उनके द्वारा समाज-गान में गाये जाने वाली प्राचीन रसिकों की रस भरी पदावलियों को सुनने, कुंज- निकुंजों में डोलने एवं प्रातःकाल के समय वहाँ की सोहनी-सेवा करने एवं श्रीप्रिया-लालजू के साक्षात् दर्शन प्राप्त करने आदि के लिये अतिशय लालायित हो उठा था, जिसका उल्लेख इन्होंने एक पद में इस प्रकार किया है -

दीजै मोहि वास ब्रज माहीं।
जुगल नाम कौ भजन निरन्तर, और कदम्बन छाहीं ॥

इन्हीं दिनों इनके पुत्र और पत्नी का देहान्त हो गया। कुछ समय बाद पिताजी भी चल बसे। अब ये अपने ग्रहस्थ धर्म से मुक्त होकर वृन्दावन चले गये और फिर शेष जीवनभर ये वहीं साधना करते रहे।
वृन्दावन में आने के पश्चात् श्रीभोलानाथजी ने श्रीराधावल्लभजी के मन्दिर के रासवंशीय सेवाधिकारी श्रीहित गोवर्धनलालजी महाराज से राधा-चरण-प्रधान, नित्य- विहार-प्राण, वृन्दावन-रसोपासना के निज मन्त्र की दीक्षा प्राप्त की और रस-भजन-भावना में अनन्यता के साथ संलग्न हो गये। इस तथ्य का उल्लेख श्रीहित किशोरीशरण 'अलि' जी ने 'श्रीहित अनन्य 'रसिकावली' में निम्न प्रकार से किया है

गुरु गोवर्द्धनलाल, चरण सेये नीकी विधि।
रीझे परम दयाल, दई करि कृपा सु हित निधि॥
रहत भावना छके, आठ हू जाम जुगल की।
गिरा मधुर में छलकी अरु नैंननि में झलकी॥
अब भोरी सखि होइ कैं, रहत सखिन के साथ जू।
परम रसिक इहि काल में, भये श्रीभोलानाथ जू॥

श्री भोलानाथ जी का सेवाकुंज से प्रेम :
श्रीभोलानाथजी का सेवाकुंज से विशेष लगाव था। इन्होंने सेवाकुंज मन्दिर में विराजमान चित्रपट-सेवा में छिपे हुए भाव को स्पष्ट करते हुए कहा है कि रसिक प्रीतम श्रीलालजी के प्रति लाड़ से भरी हुई श्रीलाड़िली जी ने प्रथम मिलन की लज्जा के कारण अपने नेत्रों को अपने श्रीचरणों में गढ़ा रखा है तथा उनके पद-संवाहन की लोल लालसा लिये श्रीलालजी के नेत्र भी उनके श्रीचरणों को लालच से भरे होकर देख रहे हैं। जैसे ही दोनों की दृष्टि एक दूसरे से मिलती है, तभी श्रीलालजी श्रीप्रियाजी की मौन स्वीकृति प्राप्तकर एवं श्रीप्रियाजी के श्रीचरणों को अपने हृदय में धारणकर, उनके श्रीचरणों को चाँपने की सेवा ललित रीति से प्रारम्भ कर देते हैं तथा उन्हें चूम-चूमकर उनकी बलिहारी लेने लगते हैं।जैसा उन्होंने इस पद में व्याख्या की है:

लाड़ भरी मुसिकात लजीली, झुकि देखत निज पाँय।
लालच भरे लाल के लोचन, ललक रहे तहँ छाय॥
युगल वदन संगम अति सुन्दर, पद पंकज उर लाय।
लालत ललित लाड़िली 'भोरी', चूमि-चूमि बलि जाय॥

श्रीभोलानाथजी प्रतिदिन प्रातः काल में सेवाकुंज एवं वृन्दावन की कुंज गलियों में झाड़ने-बुहारने का कार्य अत्यन्त प्रीति के साथ किया करते थे। इस बात का उल्लेख इन्होंने एक दोहे में इस प्रकार किया है -

या तन हू में प्रीति सौं, तुमही कौं दुलरात।
श्री वन वीथिनु रमत हैं, लिये सोहनी हाथ॥

श्री भोरी सखी की प्राण वृंदावन की रज है जो साक्षात श्री कृष्ण की भी प्राण है, जो उनके लिए साधारण न होकर उनके प्राणों के समान प्रिय है : 

कण-कण में जा रेणु के, बसत लाल के प्रान ।
हाय सोहनी ताहि याँ, साधारण मत मान ।।
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (435.6)

श्रीहित भोरीसखी जी कहते हैं कि अरी सोहनी श्रीप्रियाजी के श्रीचरणों की इस रज के प्रत्येक कण में श्रीलालजी के प्राण निवास करते हैं। अरी सोहनी इसे साधारण समझने की भूल मत कर ।

भोरी सखी के लिए श्री राधा का स्वप्नमें सेवाइतको आदेश देना :
भोलानाथजी की मनोस्थिति ऐसी थी कि वह अपनी जीविकोपार्जन के लिए न तो कुछ कर सकते थे, और न ही किसीसे कुछ मांग सकते थे ,जो करुणामई राधारानीजी की शरण में हो उसे किसीसे कुछ मांगने की आवश्यकता भी क्या। उन्होंने इसके लिए एक सुंदर युक्ति निकाल ली, सेवाकुंज में यात्री बंदरों को चने डाल जाते थे, अच्छे चने तो वे खा लेते थे और ठुड्डी छोड़ देते थे, उसी ठुड्डी को खाकर भोलानाथजी अपनी क्षुधानिवृत्ति कर लिया करते थे। परंतु स्वामिनीजी को यह बात कैसे सहन हो सकती थी कि उनका प्यारा भक्त ठुड्डी खाकर रहे, उन्होंने राधाबल्लभ मंदिर के सेवाइत को स्वप्न में आदेश दिया कि, भोरीसखी सेवाकुंज में चनों की ठुड्डी खाकर रह रही है, उसे मेरा प्रसाद प्रतिदिन लेजाकर दे दिया करो। स्वामिनीजी की कृपा से भोरीसखी के सुंदर भोजन की व्यवस्था हो गई, उन्हें बढ़िया से बढ़िया प्रसादी भोजन नित्य मिलने लगा, पर भोरीसखी राधारानीकी इतनी सी कृपा से भुलावे में आनेवाली नहीं थी। वे प्रसाद की थाल से मात्र 2 रोटी रख कर पूरा प्रसाद यमुना जी में अर्पित कर देती थीं। और उल्टा श्री राधारानी को उलाहना देने लगी कि तुम्हारी इस तुच्छसी कृपा से मेरा क्या होगा, तुमने कभी मुझसे यह भी पूछा है कि मैं चाहती क्या हूं  [वह तो श्री राधा के दर्शन के लिए व्याकुल थे]? 

तुमने आज लौं बात न पूछी, को द्वारे चिल्लात न पूछी।
जीवन बीत्यौ गोद पसारे, कहा लोभ ललचात न पूछी॥
मैं नित हौंस भरी कहिबे की, हंसि कबहूं कुसलात न पूछी।
कोटि उपाय कियै पै तुमने, का सोचत दिन रात न पूछी॥
कैसे कटत दिवस-निसि तेरे, का दुख सूखत गात न पूछी।
भोरी दीन दुखी आरत सौं, विहंसि हृदयकी बात न पूछी॥
"मैंने तो अपनी ओरसे सारे नाते तुमसे ही मान रखे हैं पर मुझे संदेह है क्या तुम भी मुझे अपनी चेरी मानती हो ? यदि तुम मुझे अपना मानती तो मेरी सुध अवश्य लेती, मुझसे पूछती कि भोरी आखिर तू चाहती क्या है ?"

श्रीभोलानाथजी का नाम से प्रेम :
श्रीभोलानाथजी की हित स्वरूप हरिवंश-नाम-स्मरण में गहरी आस्था थी। इनकी मान्यता थी कि जब तक श्वाँसों की माला के प्रत्येक मनके रूपी श्वाँस के साथ हरिवंश-नाम का उच्चारण नहीं किया जाता, तब तक नामी के निज स्वरूप और उनके नित्यविहार का दर्शन प्राप्त करना असम्भव ही है -

नाम-स्वाँस दोउ विलग चलत हैं, इनकौ भेद न मोकौं भावै॥
स्वाँसहि नाम नाम ही स्वाँसा, नाम स्वाँस कौ भेद मिटावै।
बाहिर कछु न कछू तब भीतर, जिय और नाम एक ह्वै जावै॥
तब निज रूप नाम कौ प्रगटै, तन में श्री वन सहज दिखावै।

भोरी सखी का राधा-कृष्ण के दर्शनों की लालसा :
भोरी सखी नित्य ही श्री श्यामा श्याम से उनके मिलने की प्रार्थना करती है -

"श्री राधावल्लभ रंग भरे लाल।
कबहूँ मोहि कृपा कर हेरौ, चरण शरण प्रतिपाल॥"

"कोमल चित मन मोहन, कब मेरी सुरति करैहौ।"

"कबहूँ मोहि उमगि अपनैहौ।"

"व्याकुल मन कबहूँ समझावौ।
हित हरिवंश किशोर कृपानिधि, सपने दरस दिखावौ॥"

भोरी सखी का श्री राधा के प्रति अनन्य प्रेम :
श्री राधा के प्रति प्रेम उनका स्वाभाविक था। वे श्री राधा से कभी विनती करते हैं, तो कभी उलाहना देते हैं, उनके कुछ पद निचे दिए गए हैं -

"पतित पावनी प्यारी हमारी।"

"सर्वोपरि म्हारी महारानी।"

"करुणाधाम कृपालुकिशोरी।"

"जानत प्रीति की रीति किशोरी।"

भोरी सखी का श्री वृन्दावन वास की उत्कट अभिलाषा :
भोरी सखी श्री वृन्दावन वास की उत्कट अभिलाषा में यह कह रहे हैं की "कब मुझे श्री वृन्दावन का वास प्राप्त होगा ? जहाँ नित्य श्री श्यामाश्याम विहार करते हैं।"

"कब बसिहौ ब्रज बीथीन माहीं।
जहँ नित डोलत जुगल लाडिले, दिये विमल गलबाहीं।"

"कब बसिहौं ब्रज कुंजन माहीं।"

"दीजौ मोहि वास ब्रज माहीं।"

"श्री वृन्दावन तोहि करूँ परनाम।"

ग्रन्थ रचना :
श्री भोलानाथ जी के द्वारा रचित कुल 600 पद प्राप्त होते हैं जो "प्रेम की पीर" नामक ग्रन्थ में संकलित हैं जिसमें अधिकतर विनय के पद हैं।
श्रीभोलानाथजी वृन्दावन आने से पूर्व पद रचना करने लग गये थे। इन्होंने अपनी रचनाओं में 'भोरी', 'हित भोरी' एवं 'भोरी हित' छाप प्रयुक्त की है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि इन्होंने पद रचनायें प्रारम्भ करने के पूर्व ही राधा-किंकरी-भाव से अनुभावित होकर अपना नाम श्रीहित भोरीसखी जी रख लिया था। 
वृन्दावन आने से पूर्व में रचित अधिकांश पदों में जहाँ इन्होंने स्वयं को पोच, पामर, पतित, कामी, कुटिल, दुष्ट दुर्भाग्यशाली एवं शठ आदि बताते हुए स्वामिनी श्रीराधा से अपना उद्धार करने, सखी परिकर में सम्मिलित कर विविध सेवाओं को प्रदान करने आदि की वकीलों की तर्क पूर्ण भाषा-शैली में अनुनय-विनय की है, इन पदों में एक सच्चे भक्त-हृदय की व्याकुलता एवं प्रेम की पीड़ा की झलक देखने को मिलती है; वहीं वृन्दावन आने के पश्चात् रचित हितोत्सव, होली आदि के पदों में 'हित' को पूर्ण परात्पर तत्व एवं गो. श्रीहित हरिवंशचन्द्र जी को हितावतार उद्घोषित किया गया है, ये पद अधिक प्रौढ़, शान्त-प्रकृति एवं भाव-गाम्भीर्य को लिये हुए हैं, फिर भी इनमें प्रेम की नैसर्गिक पीड़ा की अभिव्यक्ति हुई है।
श्रीभोलानाथजी ने वृन्दावन में रहते हुए पद साहित्य के सृजन के साथ-साथ ब्रह्मसूत्र पर हिन्दी में भाष्य एवं राधाबल्लभीय प्राचीन रसिकों के अनेक ग्रन्थों की टीकायें भी लिखी है। रस भारती संस्थान, वृन्दावन में इनके द्वारा लिखी गई गो. श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी की 'राधा(रस)-सुधा-निधि', गो. कृष्णचन्द्र जी की 'राधा उप सुधा निधि', गो. वृन्दावनदास जी के 'अध्ववि निर्णय', गो. ब्रजलाल जी के 'सेवा विचार', गो. प्रियालाल जी के 'उत्सव निर्णय' एवं श्री लाड़िलीदास जी की 'सुधर्म बोधिनी' की टीकाऐं संग्रहीत हैं।

लीला संवरण :
"इनहीं नैंननि सब सुख देखें। जीवन जनम सुफल करि लेखें॥" के अनुसार यद्यपि श्रीभोलानाथजी ने पूर्ण परात्पर तत्व हित किंवा प्रेम की रसमय उपासना पद्धति को अपनाकर, अनन्यता के साथ भजन-भावना पूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए, इसी जीवन में ही प्रेम की अद्वय युगल मूर्त्ति श्रीहित लाड़िली-लाल के प्रेम-रस-धाम श्रीवृन्दावन में चल रहे अविचल विहार को संप्राप्त कर लिया था; तथापि ये श्रीप्रियाजी से अति आकुलता एवं व्याकुलता के साथ प्रेमविह्वल होकर नित्य निकुंज में सहचरि वपु प्राप्त कर उनकी सेवा करने के लिये उत्सुक एवं आतुर ही नहीं बने रहे, अपितु उनसे अनुनय-विनयपूर्वक आग्रह के साथ निवेदन भी करते रहे। श्रीप्रियाजी ने इनकी विनम्र प्रार्थना एवं इनकी हार्दिक लालसा को देखते हुए, 42 वर्ष की अल्पायु में ही, 1932 की आषाढ़ शुक्ला षष्ठी के दिन, इन्हें अपनी छत्र-छाया में सदा रहने वाले अनन्तानन्त सखी परिकर में सम्मिलित कर लिया। किसी कवि हृदय रसिक ने प्रेम की पीड़ा से व्यथित इनके चारु चरित्र का प्रशस्ति-गान इन शब्दों में किया है -

जाके प्रानन संग, प्रेम की पीड़ा आई।
प्रानन ही में रमी, कछुक नैंनन में छाई॥
पीड़ा ही में, प्राननाथ के दर्शन पाये।
जुग-जुग के प्यासे नैंना, छबि देखि सिहाये॥
सही सराहि-सराहि कैं, कठिन प्रेम की पीर।
बिक जान्यौ बिनु मोल ही, हित भोरी मति धीर॥