कब ह्वैहौं हों मोरनी - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (57)

कब ह्वैहौं हों मोरनी - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (57)

कब ह्वैहौं हों मोरनी, श्री वृंदावन धाम ।
नचिहौं संग अंग मोरिकैं, सुंदर श्यामा श्याम ॥

- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (57)

कब वह सौभाग्यशाली क्षण आएगा, जब मैं श्री वृन्दावन धाम में एक मोरनी का रूप धारण करूँगी? तब मैं अपने अंगों को मरोड़-मरोड़ कर (नृत्य की मुद्रा में) सुंदर श्री श्यामा-श्याम के साथ आनंदपूर्वक नृत्य करूँगी।