प्रेम सदन की कठिन गली री ।
कै जानत ब्रजचन्द्र साँवरो कै जानत वृषभानु-लली री ।। [1]
जग-कुल कानिहुं छोड़ अपनपन, चले शीश धरि हाथ तली री।
'ललितविहारिणि' वसै प्रेमपुर जो पावै उन कृपा भली री ।। [2]
- श्री ललित विहारिणि
जिस गली में प्रेम सदन है, उस गली में चलना अत्यंत कठिन है । या तो इस मार्ग को ब्रज चंद्र साँवरे लाल श्री कृष्ण जानते हैं या फिर सर्वोपरि नित्य बिहारिनि वृषभानु नंदिनी श्री राधिका जू जानती हैं । [1]
इस गली में चलने के लिए संसार, कुल, कानि इत्यादि का मोह त्याग कर, अपने शीश को अपने हाथ में रख कर ही चला जाता है । श्री ललित विहारिणि जी कहते हैं कि इस प्रेमपुर (अर्थात् दिव्य प्रेम) को वही प्राप्त कर सकता है जिसपर श्री श्यामा श्याम की भली कृपा होती है । [2]
कै जानत ब्रजचन्द्र साँवरो कै जानत वृषभानु-लली री ।। [1]
जग-कुल कानिहुं छोड़ अपनपन, चले शीश धरि हाथ तली री।
'ललितविहारिणि' वसै प्रेमपुर जो पावै उन कृपा भली री ।। [2]
- श्री ललित विहारिणि
जिस गली में प्रेम सदन है, उस गली में चलना अत्यंत कठिन है । या तो इस मार्ग को ब्रज चंद्र साँवरे लाल श्री कृष्ण जानते हैं या फिर सर्वोपरि नित्य बिहारिनि वृषभानु नंदिनी श्री राधिका जू जानती हैं । [1]
इस गली में चलने के लिए संसार, कुल, कानि इत्यादि का मोह त्याग कर, अपने शीश को अपने हाथ में रख कर ही चला जाता है । श्री ललित विहारिणि जी कहते हैं कि इस प्रेमपुर (अर्थात् दिव्य प्रेम) को वही प्राप्त कर सकता है जिसपर श्री श्यामा श्याम की भली कृपा होती है । [2]

