श्री रसखान की जीवनी

श्री रसखान की जीवनी

जन्म और बाल्यकाल :
रसखान का जन्म सन् 1548 में हुआ माना जाता है। उनका मूल नाम सैयद इब्राहिम खान था और वे दिल्ली के आस-पास के रहने वाले थे। इनका परिवार भी भगवतभक्त था। रसखान को माता पिता के स्नेह के साथ साथ सुख ऐश्वर्य भी मिले। घर में कोई अभाव नही था।
चूँकि परिवार भर में भगवत भक्ति के संस्कार थे ,इस कारण रसखान को भी बचपन में धार्मिक जिज्ञासा विरासत में मिली थी। बृज के ठाकुर नटवरनागर नन्द किशोर भगवान कृष्ण पर इनकी अगाध श्रद्धा थी।
‘प्रेमवाटिका' के निम्नांकित दोहे -

देखि गदर हित साहिबी, दिल्ली नगर मसान।
छिनहिं बादसा-बंस की, ठसक छाँड़ि रसखान॥

इस दोहे से ज्ञात होता है की रसखान का संबंध राजवंश से था और राजवंश के घरेलु झगडे से इनका मन संसार से उदास हो गया था। 

दिल्ली के एक साहूकार के पुत्र में रसखान की आसक्ति :
दिल्ली में एक साहूकार रहता था जिसका एक पुत्र था जो बहुत ही सुन्दर था। साहूकार के पुत्र पर रसखान का चित्त लग गया जो रसखान को बहुत ही सुन्दर लगता था। रसखान उसी पुत्र के पीछे फिरते रहते और उसका जूठा भी खा लेते थे। रसखान दिन-रात उसी साहूकार के पुत्र के पास रहते। उनके जाती के लोग रसखान की बड़ी निंदा करते लेकिन रसखान को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। 
एक दिन चार वैष्णव बैठ कर भगवद्चर्चा कर रहे थे। उनमे से एक वैष्णव कह रहा था "भगवान में चित्त ऐसा लगाना चाहिए जैसे रसखान का चित्त साहूकार के पुत्र में लगा है।"
रसखान वहीँ से आ रहे थे और वैष्णवों की चर्चा में अपना नाम सुनकर वैष्णवों के पास आये और पूछने लगे "आप मेरे बारे में क्या बात कर रहे हो ?"
इसपर वैष्णवों ने उन्हें सब बात बताई। रसखान ने कहा "प्रभु का स्वरुप दिखे तो मैं अवश्य उनमे चित्त लगाऊं।"
इसपर उन वैष्णवों ने रसखान को श्रीनाथजी का चित्र दिखाया जिसको देखते ही रसखान का चित्त श्रीनाथजी की सुन्दर रूप-माधुरी में आसक्त हो गया और उन्होंने श्रीनाथजी का चित्र अपने पास रख लिया और यह निश्चय किया की जब श्रीनाथजी का यह स्वरुप प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देखूंगा तभी अन्न ग्रहण करूँगा। 

रसखान का वृन्दावन आगमन :
रसखान तुरंत घोड़े पर बैठे और वृन्दावन की ओर चल दिए। एक रात में वे वृन्दावन आ गए। वृन्दावन में पूरे दिन वेश बदलकर सब मंदिरों में दर्शन करने गए लेकिन उन्हें श्रीनाथजी का स्वरुप कहीं नहीं दिखा। वहां से रसखान गोवर्धन आ गए और वेश बदलकर श्रीनाथजी के मंदिर में प्रवेश करने लगे लेकिन द्वार पर ही सेवक ने उन्हें पहचान लिया कि यह वैष्णव नहीं हैं म्लेच्छ हैं, इसलिए सेवक ने धक्के देकर रसखान को बाहर निकाल दिया। रसखान जाकर गोविंदकुंड पर बैठ गए। 3 दिन हो गए थे रसखान को अन्न ग्रहण किये हुए लेकिन रसखान के चित्त में श्रीनाथजी का रूप बसा हुआ था इसलिए उन्हें खाने पिने का विचार ही नहीं हो रहा था।

रसखान पर श्रीनाथजी की करुणादृष्टि और गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी से दीक्षा :
श्रीनाथजी ने रसखान की यह दशा देखि तो विचारने लगे की यह जीव दैवी है, शुद्ध है और सात्विक है, मेरा भक्त है, इसे दर्शन देना चाहिए। ऐसा विचार कर श्रीनाथजी गोविंदकुंड पर पधारे और रसखान को दर्शन दिए। श्रीनाथजी का दर्शन करते ही रसखान उन्हें पकड़ने के लिए दौड़े लेकिन श्रीनाथजी भाग गए। 
मंदिर में श्रीनाथजी ने गुसाईंजी से कहा "गोविन्द कुंड पर मेरा एक भक्त रसखान बैठा है, वह दैवी है लेकिन म्लेच्छ शरीर को प्राप्त हुआ है, उसके ऊपर आप कृपा कीजिये और उसे अपने शरण में लीजिये, जब तक जीव का सम्बन्ध आप से नहीं होता तब तक मैं उस जीव का स्पर्श नहीं करता और उससे बोलता भी नहीं, उसका भोग भी स्वीकार नहीं करता, इसलिए आप उसे अंगीकार कीजिये।"
श्रीनाथजी के वचन सुनकर गुसाईंजी गोविंदकुंड पर पधारे और रसखान को नाम दीक्षा प्रदान की। रसखान को श्रीनाथजी का दर्शन गुसाईं जी के स्वरूप में हुआ। तब गुसाईं जी रसखान को अपने संग मंदिर ले आये और रसखान को श्रीनाथजी के उत्थापन के दर्शन कराये और महाप्रसाद दिया। श्रीनाथजी का दर्शन कर रसखान उनके रूप में आसक्त होने लगे और श्रीनाथजी को अनेक पद सुनाने लगे। 

रसखान को श्री कृष्ण की प्राप्ति :
रसखान ने हर जगह श्री कृष्ण को ढूंढ लिया लेकिन श्री कृष्ण कहीं भी नहीं मिले, रसखान के इस सवैये से स्पष्ट है की उन्हें श्री कृष्ण की प्राप्ति किस स्थान पर हुई -

ब्रम्ह मैं ढूंढ़्यो पुरानन-गायन, वेद रिचा सुनि चौगुने चायन।
देख्यो सुन्यो कबहूँ न कहूँ, वह कैसे सरूप औ कैसे सुभायन॥
टेरत हेरत हारि परयो, रसखान बतायो न लोग लुगायन।
देख्यो दुरो वह कुंज कुटीर में, बैठो पलोटतु राधिका पायन॥

रसखान का ब्रज के प्रति प्रेम :
रसखान को ब्रज से कैसा प्रेम था, यह बताना बहुत कठिन है। वे स्वयं ही इस सवैये से अपने ब्रज प्रेम का वर्णन कर रहे हैं -

मानुष हौं तो वही रसखानि बसौ ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहा बसु मेरो चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि को जो धर्यौ कर छत्र पुरंदर कारन।
जो खग हौं तौ बसेरो करौं मिलि कालिंदी-कूल-कदंब की डारन॥

काव्य रचना :
रसखान ने ब्रजभाषा में अनेक दोहा, कवित्त और सवैयों की रचना की है। सुजान रसखान और प्रेमवाटिका उनकी उपलब्ध कृतियाँ हैं। रसखान रचनावली के नाम से उनकी रचनाओं का संग्रह मिलता है। प्रमुख कृष्णभक्त कवि रसखान की अनुरक्ति न केवल कृष्ण के प्रति प्रकट हुई है बल्कि कृष्ण-भूमि के प्रति भी उनका अनन्य अनुराग व्यक्त हुआ है। उनके काव्य में कृष्ण की रूप-माधुरी, ब्रज-महिमा, राधा-कृष्ण की प्रेम-लीलाओं का मनोहर वर्णन मिलता है ।इनके पदों को ब्रज के सेवैया एवं श्री बाँके बिहारी जी के सेवैया के रूप में अनेक मंदिरों एवं स्थानों में गाया जाता है ।  वे अपनी प्रेम की तन्मयता, भाव-विह्नलता और आसक्ति के उल्लास के लिए जितने प्रसिद्ध हैं उतने ही अपनी भाषा की मार्मिकता, शब्द-चयन तथा व्यंजक शैली के लिए। एक उदहारण -

कानन दै अंगुरी रहिहौं, जबहों मुरली धुनि मंद बजैहैं।
मोहिनी तानन सों रसखानि, अटा चढ़ि गोधन गैहैं तो गैहैं॥
टेरि कहौं सिगरे ब्रजलोगनि, काल्हि कोऊ कितनो समुझैहैं।
माई री वा मुख की मुसकानि, सम्हारि न जैहैं न जैहैं न जैहैं॥

लीला संवरण :
वर्ष 1628 में रसखान ने ब्रज भूमि में ही अपना देह त्याग किया और भगवल्लीला को प्राप्त हुए। मथुरा जिले में महाबन में इनकी समाधि है।