आजु प्यारी के संगि रसिक राइ गुपाल - श्री केवल राम जी, रास मान के पद (17)

आजु प्यारी के संगि रसिक राइ गुपाल - श्री केवल राम जी, रास मान के पद (17)

(राग पूर्वी)
आजु प्यारी के संगि रसिक राइ गुपाल ।
अति छवि पावत गावत दोउ चलत चाल मराल ।। [1]
करत विहार विलास रास मों मान लेत करताल ।
केवलजन रसु बड़ौ (है) परसपर द्रुम बेली बेहाल ।। [2]

- श्री केवल राम जी, रास मान के पद (17)

आज श्री गोपाल के संग प्यारी राधिका की छवि अत्यंत मनोहर लग रही है । वे दोनों मधुर गान करते हुए आ रहे हैं एवं उनकी चाल मराल के समान है । [1]

युगल सरकार रास विहार कर विलास कर रहे हैं एवं संगीत की ताल में ताली बजा रहे हैं। श्री केवलराम कहते हैं, "उनका दिव्य प्रेम रस पल-पल बढ़ता जा रहा है, और वृक्ष लताएँ इत्यादि प्रेम में डूब रहे हैं"। [2]