हमारैं साहिबनी वन रानी - श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (96)

हमारैं साहिबनी वन रानी - श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (96)

(राग विहागरौ)
हमारैं साहिबनी वन रानी ।
बेद पुरान जासु जस गावै नन्द-नंदन सुखदानी ।। [1]
रूप अगाध हरन भव बाधा राधा भूषन बानी ।
एक भरोसो बल उनही कौ बात नहीं यह छानी ।। [2]
जाके प्रेम पग्यौ मन मोहन वृन्दावन रजधानी ।
करत विहार रसिक चूड़ामनि पल पल तृपति न मानी ।। [3]
जोगी जपी तपी सन्यासी रस विहीन जे ज्ञानी ।
यह सुख तिनकों सुपने हू नहि ‘गोबिंदसरन’ बखानी ।। [4]

- श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (96)

हमारी साहिबिनी (स्वामिनी) वृंदावन की महारानी श्री राधिका रानी है । जिस नंदनंदन [श्री कृष्ण] का यश वेद पुराण इत्यादि गाते हैं वह उनको भी सुख का दान करने वाली हैं । [1]

श्री राधा अगाध रूप का समुद्र हैं, भव बाधा का हरण करने वाली हैं, एवं परम रसिक प्रेमी जनों ने प्रेम की मुकुटमणि स्वरूपा श्री राधा महारानी का ही केवल भरोसा एवं बल रखा है एवं अपनी वाणियों में बिना किसी आशंका के श्री राधा की ही अनन्य भाव से अद्भुत महिमा का यशोगान गाया है । [2]

श्री राधा के प्रेम में ही श्री कृष्ण नित्य पगे हुए रहते हैं जिनकी राजधानी श्री वृंदावन धाम है । रसिक चूड़ामनि श्री श्याम सुंदर पल पल श्री राधिका संग नित्य विहार करते हैं एवं एक क्षण के लिए भी तृप्त नहीं होते । [3]

श्री गोविंद शरण जी डंके की चोट पर कहते हैं कि चाहे योगी हो, जपी हो, तपी हो, संस्यासी हो, या ज्ञानी हो, यह अद्भुत सुख जो हमको श्री राधा प्रदान करती हैं वह उनके सपने में भी स्पर्श नहीं कर सकता  [बिना श्री राधा कृपा के] । [4]