श्री बिल्वमंगल ठाकुर की जीवनी

श्री बिल्वमंगल ठाकुर की जीवनी

जन्म:
श्री बिल्वमंगल की जन्म तिथि के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं है। श्री बिल्वमंगल का जन्म दक्षिण भारत में 9वीं शताब्दी के आसपास एक पवित्र ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

आध्यात्मिक दीक्षा:
श्री बिल्वमंगल ने विष्णुस्वामी संप्रदाय में सोमगिरि से दीक्षा ली थी, जो उनके आध्यात्मिक गुरु थे। सोमागिरी ने उन्हें 'लीलाशुक' नाम प्रदान किया।

श्री बिल्वमंगल के पिछले जन्म की कथा :
अपने पिछले जन्म में श्री बिल्वमंगल एक महान संन्यासी और भगवान कृष्ण के बहुत बड़े भक्त थे। वह भाव के स्तर पर पहुँच चुके थे (कृष्ण को अत्यधिक प्रेम करने वाला)। उन्हें श्रीमद भागवतम उत्सवों के आयोजन का शौक था जिसके बाद वे श्रोताओं को प्रसाद वितरित करते थे।
एक बार उत्सव का आयोजन करते समय उन्होंने अपना सारा धन खर्च कर दिया। उन्हें भक्तों को खिलाने के लिए और धन की आवश्यकता थी। इसलिए वह धन की खोज में बाहर निकले। चारों ओर घूमते हुए उन्होंने युवा राजकुमारी का दाह संस्कार देखा, जिनकी 18 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई थी। उनके दुखी पिता, माता और सभी परिवार के लोग उपस्थित थे। पिता ने अर्थी को आग दिया और फिर सब वहाँ से चले गए। राजकुमारी अपने शरीर पर कई हीरे और सोने के गहनों के साथ जल रही थी। सन्यासी (बिल्वमंगल ठाकुर) ने यह सब देखा और सोचा:
“एक राजकुमारी के मृत शरीर के लिए इन सभी मूल्यवान गहनों का क्या उपयोग है? बेहतर यही है कि यह सब ले लूँ और इसे भगवान कृष्ण और भक्तों की सेवा में उपयोग करूँ।"
ऐसा विचार कर वे शव के पास पहुंचे और गहनों को लेने की कोशिश की लेकिन फिर उन्होंने एक आवाज सुनी:
"रूक जाओ ! इसे मत लो!" यह मृत राजकुमारी की आवाज थी। सन्यासी चौंक गए।
"यदि आपको धन की आवश्यकता है तो मेरे पिता राजा के पास जाओ। उनसे कहो कि मैंने तुम्हें भेजा है। मेरे बिस्तर के नीचे, एक बड़ा खजाना है। मेरे पिता से उस धन को मांग लो और उस धन का उपयोग भक्तों और भगवान कृष्ण की सेवा के लिए करो", मृत राजकुमारी बोली।
सन्यासी (बिल्वमंगल ठाकुर) खुशी-खुशी राजा के पास गए और सब बातें बता दी। राजा ने देखा और वास्तव में राजकुमारी के बिस्तर के नीचे एक बड़ा खजाना पाया। राजा ने खुशी-खुशी उस धन को सन्यासी को दान कर दिया। बिल्वमंगल ने जाकर सारी संपत्ति भागवतम उत्सव पर खर्च कर दी। लेकिन अंत में फिर से कुछ धन की कमी हो गई। इसलिए वे श्मशान घाट पर राजकुमारी के पास गए और हीरे का हार ले लिया। जैसे ही वे जाने लगे तो उन्होंने मृत राजकुमारी की आवाज सुनी:
"इस हार को लेकर आपने बहुत बड़ी गलती की है। मैं आपको श्राप देती हूं कि यद्यपि आप कृष्ण के प्रेम में बहुत ऊँची अवस्था पर पहुँच गए हैं, आपको एक बार और जन्म लेना होगा और अनैतिक जीवन जीना होगा।"
अपने अगले जन्म में, संन्यासी ने एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जन्म लिया जो व्यभिचारी था। राजकुमारी ने भी वेश्या 'चिंतामणि' के रूप में फिर से जन्म लिया।

श्री बिल्वमंगल और वेश्या चिंतामणि का प्रसंग :
श्री बिल्वमंगल एक बहुत धनी व्यक्ति थे, और बहुत ही व्यभिचारी व्यक्ति थे। उन्होंने चिंतामणि नाम की एक वेश्या का संग कर रखा था। वह वेश्या के प्रति इतने समर्पित थे कि एक बार वह अपने पिता की मृत्यु समारोह कर रहे थे और पुजारी से कह रहे थे, "कृपया जल्दी करो। कृपया इसे जल्दी करो। मुझे जाना है। मुझे जाना है।" (उसे वेश्या के घर जाना था) फिर लोगों को भोजन कराया गया। बिल्वमंगल ने एक थैले में स्वादिष्ट भोजन रख लिया, और वह उस वेश्या के घर के लिए निकल पड़े। लेकिन जब वह अपने घर से बाहर निकले तो मूसलाधार बारिश हो रही थी। उन्हें उस बारिश की परवाह नहीं थी। वह नदी के किनारे आये, लेकिन कोई नाव नहीं थी, और नदी लहरा रही थी। लहरें बहुत उग्र थीं। बिल्वमंगल ने सोचा कि "मैं दूसरी तरफ कैसे जाऊँ?" वह प्रतिदिन नदी के दूसरी ओर जाते थे। किसी तरह तैरकर बिल्वमंगल ने नदी पार किया।
वेश्या ने सोचा, "आज बहुत बारिश हो रही है, और बिल्वमंगल नहीं आ पाएंगे।" इसलिए उसने फाटक बंद किया और सोने चली गई। जब बिल्वमंगल उस वैश्या के घर आये तो देखा कि फाटक बंद था और अभी भी बारिश हो रही थी। सो वे एक सांप को रस्सी समझ कर पकड़कर दीवार के पार उतरे और वैश्या के पास आये। वैश्या यह सब देखकर चौंक गई और बोली, "आप यहाँ कैसे आए?" बिल्वमंगल ने सब कुछ बता दिया।
वैश्या ने कहा, "जितना प्रेम आप मुझसे करते हो यदि उतना ही श्री कृष्ण से करते तो आपको परम शांति की प्राप्ति होती।"
चिंतामणि के इन शब्दों ने बिल्वमंगल के ह्रदय को झकझोर दिया। उन्होंने वैश्या को सदुपदेश के लिए प्रणाम किया और तुरंत वहां से लौट आये।

वृंदावन आते हुए मार्ग में अपनी आँखें फोड़ लेना :
चिंतामणि के वचनों से बिल्वमंगल को संसार से वैराग्य हो गया और उन्होंने वृंदावन में श्री कृष्ण की आराधना करने का निश्चय किया। बिल्वमंगल वृंदावन के लिए निकल पड़े। मार्ग में बिल्वमंगल ने एक सुन्दर स्त्री को देखा और उसपर आकर्षित हो गये क्यूँकि उन्हें व्यभिचार का अभ्यास हो गया था। तो वे उसके पीछे-पीछे चलने लगे। हालांकि उन्होंने सोचा कि मैं श्री कृष्ण की आराधना करने के लिए वृंदावन जा रहा था, और यहां मैं एक महिला के पीछे जा रहा हूं। यह सोचकर वे सावधान हो गए और वृंदावन की ओर चलने लगे। रास्ते में वे फिर से दूसरी स्त्री की ओर आकर्षित हो गए और उस स्त्री के पीछे-पीछे चलने लगे। वह स्त्री एक सम्मानित परिवार की थी।
सो वह उस स्त्री के घर के फाटक पर आ गए। उस स्त्री ने अपने पति से कहा, "यह आदमी मेरा पीछा कर रहा है। कृपया उससे पूछो, 'यह मेरा पीछा क्यों कर रहा है?"
तो पति ने पूछा, "प्रिय महोदय, आप एक संत प्रतीत होते हैं, और आप एक बहुत ही कुलीन परिवार से हैं। आपकी उपस्थिति से मैं जान गया हूं। आप क्या चाहते हैं? आप मेरी पत्नी का अनुसरण क्यों कर रहे हैं?"
बिल्वमंगल ने कहा, "हाँ, मैं तुम्हारी पत्नी का अनुसरण कर रहा हूँ क्योंकि मैं उसे गले लगाना चाहता हूँ।"
पति ने कहा "ओह, आप गले लगाना चाहते हैं? चलिए भीतर, आपका स्वागत है।"
पति ने अपनी पत्नी को आदेश दिया "यहाँ एक संत पधारे हैं। वे आपको गले लगाना चाहते हैं। इसलिए कृपया सुन्दर श्रृंगार कर संत की सेवा में उपस्थित हो जाओ।"
तो पत्नी ने भी पति के निर्देशों का पालन किया क्योंकि पत्नी का कर्तव्य अपने पति के निर्देशों का पालन करना है। जब वह स्त्री बिल्वमंगल के सामने आई, तो उन्होंने सोचा "ये पति-पत्नी गृहस्थ हैं, फिर भी एक संत की सेवा के लिए अपना सब कुछ न्योंछावर  करने के लिए तैयार हैं, और मैं साधु होने के बाद भी श्री कृष्ण को भूलकर इस स्त्री के पीछे यहाँ चला आया, धिक्कार है मुझ पर।"
यह सोचकर उन्होंने कहा, "हे माता, क्या आप मुझे अपने हेयरपिन (बालों में लगाने के लिए एक काँटेदार चीज़) देंगी?"
स्त्री ने कहा "हाँ। लेकिन क्यों?"
श्री बिल्वमंगल ने कहा, "मुझे किसी चीज के लिए उनकी जरूरत है।"
स्त्री ने उनको अपना हेयरपिन दे दिया। फिर बिल्वमंगल ने हेयरपिन लिया और तुरंत अपनी आँखों में छेद कर दिया और वे अंधे हो गए। उनकी आंखों से खून बहने लगा। पति-पत्नी घबरा गए और उन्हें वैद्य के पास ले जाना चाहा लेकिन बिल्वमंगल ने कहा, "मैं ठीक हूं। ये आंखें मेरी दुश्मन थीं, अब मुझे ये और परेशान नहीं करेंगी।"

अंधे बिल्वमंगल का वृंदावन आना और श्री कृष्ण का उनकी सेवा करना :
उस अंधेपन में बिल्वमंगल वृंदावन के लिए चल पड़े। वे श्री कृष्ण का स्मरण कर लगातार रो रहे थे। वे बहुत पश्चाताप कर रहे थे और यही उनकी तपस्या थी। किसी तरह वे वृंदावन पहुंचे। उन्होंने कई दिनों से कुछ नहीं खाया था। तो कृष्ण की कृपा से, कृष्ण एक ब्रजवासी लड़के के रूप में आए और कहा "बाबा, तुम भूखे क्यों मर रहे हो? तुम थोड़ा दूध क्यों नहीं लेते?"
बिल्वमंगल ने कहा, "तुम कौन हो?"
कृष्ण ने कहा "मैं इस गाँव में रहता हूँ। मैं एक गोपालक लड़का हूँ। मेरा नाम गोपाल है। अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हें रोज कुछ दूध दे दूंगा।"
बिल्वमंगल ने कहा "ठीक है।"
तो कृष्ण उन्हें रोज दूध देते थे और वे दोनों मित्र बन गए। जब बिल्वमंगल श्लोक लिखते थे तो कृष्ण उनके पास बैठते थे।
बिल्वमंगल श्री कृष्ण के लिए गाते थे, और कृष्ण स्वयं आकर सुनते थे। गोपाल (कृष्ण) उनके बगल में एक अच्छे बालक की तरह बैठते थे, उनके गाने की सराहना भी करते लेकिन उनका स्पर्श नहीं करते थे। श्री कृष्ण बिल्वमंगल को अपना प्रसाद देते थे और उन्हें एक सुरक्षित विश्राम स्थान पर ले जाया करते थे। क्योंकि वे अंधे थे, इसलिए बिल्वमंगल को इस प्यारे ब्रजवासी लड़के की पहचान नहीं पता थी। फिर एक दिन कृष्ण ने अंधे बिल्वमंगल के लिए अपनी मनोरम बांसुरी बजाई। बांसुरी की मधुर धुन को सुनकर बिल्वमंगल श्यामसुंदर के सुंदर मधुर रूप को देखने की इच्छा से छटपटाने लगे।

पुनः प्रसन्नेन्दुमुखेन तेजसा पुरोऽवतीर्णस्य कृपामहाम्बुधेः ।
तदेव लीलामुरलीरवामृतं समाधिविघ्नाय कदा नु मे भवेत् ।।
- श्री बिल्वमंगल, श्री कृष्ण कर्णामृतम (34)
“हे श्रीकृष्ण! प्रसन्न चन्द्रमा के समान मुख वाले तेज से मेरे सामने पुनः प्रकट होने वाली श्रीकृष्णकृपासमुद्र की उसी लीला-मुरली की नादामृत-लहरी से कब मेरी समाधि में विघ्न होगा ?”

बांसुरी की मधुर धुन से बिल्वमंगल यह जान गए की यह "ब्रजवासी लड़का" वास्तव में उनके जीवन का प्राण और उनके ह्रदय का प्रेम था, वे कृष्ण को छूने के लिए उद्दत हुए लेकिन चंचल गोपाल बच निकले और उन्होंने बिल्वमंगल के हाथ का स्पर्श किया, मुस्कराकर भाग गए। गाते हुए बिल्वमंगल ने कहा -

हस्तमुत्क्षिप्य यातोसि बलात्कृष्ण किमद्भुतम्‌ ।
हृदयाद्यदि निर्यासि पौरुषं गणयामि ते ॥
- श्री कृष्ण कर्णामृतम् (3.97)
"मेरा हाथ छुड़ा कर, हे कृष्ण, तुम भाग गए हो - इसमें अद्भुत क्या है? मैं तुम्हें बलवान तभी मानूंगा जब तुम मेरे हृदय से भाग कर दिखाओ !”

श्री बिल्वमंगल वृंदावन के ब्रह्म कुंड में एक पेड़ के नीचे 700 वर्षों तक अपनी योग शक्तियों का उपयोग कर निवास किया।

रचनाएँ :
बिल्वमंगल ने कृष्ण के प्रेम से भरे कई छंद और गीत लिखे। उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति 'कृष्ण कर्णामृतम्', श्री कृष्ण की वृंदावन माधुरी लीला में श्री राधारानी की सर्वोच्च स्थिति को प्रकट करने वाली पहली प्रामाणिक पुस्तकों में से एक थी।
कृष्ण कर्णामृतम् के अलावा, बिल्वमंगल ठाकुर ने गोविंद दामोदर स्तोत्र लिखा जिसमें श्री कृष्ण की महिमा और स्तुति के 71 श्लोक हैं।

लीला संवरण :
श्री बिल्वमंगल के लीला प्रवेश का वर्ष अभी भी अज्ञात है। उनकी समाधि वृंदावन के गोपीनाथ बाजार में स्थित है।