लावण्यामृतवार्त्तया जगदिदं संप्लावयंती - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (61)

लावण्यामृतवार्त्तया जगदिदं संप्लावयंती - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (61)

लावण्यामृतवार्त्तया जगदिदं संप्लावयंती शरद्राका चन्द्रमनंतमेव वदनं ज्योत्स्नाभिरातन्वती ।
श्रीवृन्दावन कुंज मंजु गृहिणी काप्यस्ति तुच्छामहो कुर्वाणाखिल साध्य साधन कथां दत्त्वा स्वदास्योत्सवम् ।।

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (61)

(अपने) रोचक एवं रसपूर्ण वार्तालाप से इस जगत को आप्लावित (सराबोर) करती हुई (एवं) मुखचन्द्र की चाँदनी से शरद ऋतु के अनन्त पूर्ण चन्द्रों का विस्तार करती हुई (विकसित करती हुई) तथा अपना दास्य रूप उत्साह प्रदान करके समस्त साध्य-साधन की चर्चा को, अहो, तुच्छ बनाती हुई, श्रीवृन्दावन कुंज-सदन की कोई अनिर्वचनीय स्वामिनी (श्री राधा) विराजमान हैं ।