हाहा वृंदा विपिन रम्य अति - श्री प्रियादास जी, चाहवेली (32)

हाहा वृंदा विपिन रम्य अति - श्री प्रियादास जी, चाहवेली (32)

हाहा वृंदा विपिन रम्य अति, सर्वोपरि रस धाम ।
दरशावौ काहू विधि छविनिधि, सुखनिधि श्यामा श्याम॥

- श्री प्रियादास जी, चाहवेली (32)

हे श्री वृन्दावन! तुम अत्यंत रमणीय और सर्वोपरि रस-धाम हो। मेरी यही विनती है कि हे श्रीवन! आप किसी तरह मुझे अपनी उस अलौकिक छवि और सुखों की निधि—श्री श्यामा-श्याम (श्री राधा-कृष्ण) के दर्शन करा दीजिये।