एक आस तुव चरनन प्यारी - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (5)

एक आस तुव चरनन प्यारी - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (5)

(राग भैरवी व यमन)
एक आस तुव चरनन प्यारी ।
बहुत गई यह बयस वृथा ही सेवत विषय करत अघ भारी ।। [1]
युगल नाम मुख रटौं निरन्तर, नयनन देखूँ छबि तुम्हारी ।
ललित लड़ैती देहु चरण रति करुणालय वल लेहु संभारी ।। [2]

- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (5)

हे श्री राधा, मेरी आस बस एक आपके चरणों तक ही सीमित हैं। मैं इस मायिक जगत में भटकते हुए, मनमाने अपराध करते हुए, एवं विषयों को ग्रहण करते करते थक गया हूँ, एवं मेरी आयु इस मिथ्या भोग विलास में ही नष्ट हो गयी है ।[1]

ऐसी कृपा करो कि अब मैं नित्य ही युगल नाम का जप करूं और अपने नयनों से तुम्हारी छवि निहारूँ । श्री ललित लड़ैती जी कहते हैं कि, "हे श्री राधा, मुझे अपने चरण कमलों में रति प्रदान कर अपनी कृपा बल से मुझे सम्भाल लिजिय।" [2]